सपने में रास्ता भटक जाना

सबसे ज़्यादा बताए जाने वाले सपनों में एक, और लगभग हमेशा किसी जानी-पहचानी जगह में, जो इस तरह बदल गई है कि कोई गली सही जगह नहीं पहुँचाती।

ऐसा इंसान कम मिलेगा जिसने यह सपना कभी न देखा हो, और इसमें कोई अर्थ ढूँढने से पहले यही बात जान लेनी चाहिए। आम पाठ भटकने को भूगोल का नहीं, दिशा का मामला मानता है: कोई फ़ैसला जो अब तक खुला पड़ा है, कोई रास्ता जो पहले चलता था और अब नहीं चलता, या कुछ हफ़्ते जिनमें अगला क़दम सचमुच साफ़ नहीं। और लोग जो बताते हैं वह किसी परदेस का दृश्य शायद ही होता है। वह अपना ही शहर होता है या कोई पुराना दफ़्तर, बस इतना बदला हुआ कि कोई गली वहाँ नहीं पहुँचाती जहाँ पहुँचाना चाहिए।

इस सपने की जानी-पहचानी शक्लें

  • शहर में भटकना: सड़कों के नाम बदल जाते हैं और जाना-पहचाना मोड़ कहीं नहीं खुलता, जिसे पढ़ने वाले उस ज़िंदगी से जोड़ते हैं जो दिमाग़ में रखे नक़्शे से तेज़ बदल गई हो।
  • इमारत के भीतर भटकना: गलियारे जो घूमकर वहीं लौट आते हैं, ऐसी मंज़िलें जो होनी ही नहीं चाहिए, ग़लत तरफ़ लगे दरवाज़े। यह रूप उनके यहाँ ज़्यादा आता है जिनका जागते हुए किसी बड़े महकमे से पाला पड़ा हो।
  • फ़ोन बंद हो जाना: बहुत पुराने सपने में नया जुड़ा हिस्सा, जिसे आमतौर पर ख़ुद से बाहर की किसी चीज़ पर टिके रहने के रूप में पढ़ा जाता है, फ़ोन के बारे में इसका कुछ नहीं।
  • साथ वाले आगे निकल जाना: जो लोग बिना ध्यान दिए चलते रहते हैं, वे पाठ को दिशा से हटाकर अपनेपन की तरफ़ खींच लेते हैं।

यह सपना किन दिनों आता है

इसके आने के दिन आमतौर पर बदलाव के दिन होते हैं। घर बदलना, नई नौकरी का पहला महीना, लंबे रिश्ते का ख़त्म होना, कोई कोर्स पूरा हो जाना, एक मुल्क छोड़कर दूसरे में जा बसना। सफ़र की सीधी थकान भी इसे बुला लेती है, और जिसने एक शाम अनजान क़स्बे में 4 प्रतिशत बैटरी लेकर चक्कर काटे हों वह ख़ुद पहचान लेगा कि रात का सामान कहाँ से आया।

अपना सपना ख़ुद पढ़ना

एक ही दृश्य दो लोगों पर एक जैसा नहीं बैठता। जिसका काम ही रास्ता ढूँढना है, या जो पहाड़ों में चलता है, उसके लिए यह हालत नियम-क़ायदों वाला पेशेवर मामला है। जिसे कभी दिशा का अंदाज़ा रहा ही नहीं, वह इसे पीछे बजते शोर की तरह लेता है। इनमें कोई ग़लत नहीं, और दोनों किसी तय अर्थ से बेहतर हैं, क्योंकि यह सपना न जानने के साथ तुम्हारे अपने रिश्ते से बना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जानी-पहचानी जगह में ही मुझे भटकना क्यों पड़ता है?
लोगों के बताए ज़्यादातर सपनों में जगह जानी-पहचानी ही होती है, और पढ़ने वालों को यही सबसे काम की बात लगती है। अनजान शहर सिर्फ़ अजनबीपन कहता, जबकि अपना शहर जब क़ायदे से चलना बंद कर दे तो वह पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने की कहीं तेज़ तस्वीर बन जाता है।
फ़ैसला हो जाने पर क्या ये सपने रुक जाते हैं?
बहुत लोग बताते हैं कि उलझन सुलझते ही ये धीरे-धीरे कम हो गए, पर इसकी कोई गारंटी नहीं और कोई तारीख़ भी नहीं। नींद इस बात को पकड़ती है कि इंसान भीतर से कितना जम चुका है, इसकी नहीं कि उसने बाहर क्या ऐलान किया, इसलिए फ़ैसले के बाद भी ये दृश्य कुछ दिन आते रह सकते हैं।

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