ऐसी तस्वीर जिसकी शारीरिक वजह हाथ भर की दूरी पर होती है, और जिसका परंपरागत पाठ मेहनत के पसीने को घबराहट के पसीने से अलग रखता है।
सपनों के पूरे कोश में शायद यही वह तस्वीर है जिसकी सीधी वजह सोने वाले से एक हाथ की दूरी पर पड़ी होती है। भारी रज़ाई, गरम रात, बुख़ार, देर से खाया खाना या सोने से पहले पिया गया कुछ, हर चीज़ यह एहसास बना सकती है, और सोता दिमाग़ शरीर जो कर रहा हो उसके इर्द-गिर्द कहानी बुनने में बहुत माहिर है।
जहाँ तस्वीर सचमुच कुछ कह रही होती है, वहाँ पढ़ने वाले उसे वजह के हिसाब से बाँटते हैं। काम का पसीना, चढ़ाई का, बोझ उठाने या दौड़ने का, कमाई हुई तरक़्क़ी के साथ बैठता है और भले रूपों में गिना जाता है। बिना मेहनत का पसीना, ठहरे हुए कमरे या चुपचाप चलती बैठक में, घबराहट वाली तस्वीरों में शामिल हो जाता है और आमतौर पर उस ताक़त की तरह देखा जाता है जो कुछ करने में नहीं, किसी चीज़ को जोड़े रखने में ख़र्च हो रही है।
इन क़िस्सों में एक ब्योरा बार-बार लौटता है: कोई देख लेता है। व्याख्याएँ उसी शर्मिंदगी को पकड़ती हैं, क्योंकि यह उन गिनी-चुनी चीज़ों में है जिन्हें छिपाकर नहीं दिखाया जा सकता। उस रूप में तस्वीर खुल जाने वाले सपनों के साथ बैठती है, कपड़ों की कमी वाले सपनों के पास, और उसे इस डर से जोड़ा जाता है कि जो ज़ोर लग रहा है वह उन लोगों को दिख जाएगा जिन्हें देखने वाला इससे बाहर रखना चाहता था।
पुरानी सूचियाँ इसे अलग रखती हैं। जिसके पीछे कोई गरमी न हो, उस ठंडे पसीने को मेहनत नहीं, दहशत की तरह पढ़ा जाता था, और आज के पाठ भी यह बँटवारा लगभग वैसा ही सँभाले हुए हैं।
जो कोई पाठ नहीं कर सकता वह है तुम्हारे शरीर पर कुछ कहना। यह पन्ना सेहत की सलाह नहीं है और किसी की हालत पर कोई दावा नहीं ठोकता। जिसे रोज़मर्रा में बहुत पसीना आता है उसके लिए यह पूरी तस्वीर उससे कहीं कम अनोखी है जिसे कभी-कभार आता है, और यह फ़र्क़ कोश का नहीं, देखने वाले का है।


