नाच का पाठ क़दमों से नहीं, एहसास से बनता है। परंपरा इसे खुलकर बाहर आने का दृश्य कहती है, और सवाल यह रहता है कि देख कौन रहा था।
नाच सपने में पीछे कहीं नहीं होता, वह पूरा दृश्य घेर लेता है। परंपरा इसे क़दमों से नहीं, एहसास से पढ़ती आई है: जो चीज़ भीतर रुकी पड़ी थी वह हिलने लगी, और पुरानी किताबें इसे जश्न, मेलजोल और नज़दीकी से जोड़ती हैं। जागने पर याद भी यही रहता है कि कोई देख रहा था या नहीं, शरीर को पता था या नहीं कि करना क्या है, और फ़र्श पर और कौन था।
अक्सर पास ही कोई सीधी वजह पड़ी होती है। शादी का न्योता, संगीत में बीती लंबी रात, वह क्लास जिसमें नाम लिखाने का इरादा तुम्हारा टलता रहा, या कई हफ़्ते जिनमें शरीर लगभग हिला ही नहीं। बदन की बेचैनी सपने में हरकत बनकर लौटती है, और नाच से ज़्यादा मिलनसार हरकत कोई है नहीं। जो लोग जागते हुए नाचते हैं वे इसका सपना उसी तरह देखते हैं जैसे गाने वाले रियाज़ का, और उनके लिए इस दृश्य का बोझ किसी कोश के बताए बोझ से कहीं कम होता है।
सीखा हुआ नर्तक और वह इंसान जिसने कभी होश में एक क़दम नहीं रखा, दोनों एक ही सपना नहीं देख रहे, भले तस्वीर हूबहू एक हो। ख़ुद से पूछो कि रोज़ की ज़िंदगी में नाचना तुमसे क्या माँगता है और बदले में क्या देता है, फिर रात को उसी तराज़ू पर रखो। परंपरा नाच को ख़ुशी कहती है, पर यहाँ ख़ुशी सबकी एक नहीं: किसी के लिए नाच वाला कमरा पूरी इमारत का सबसे डरावना कोना है, और वहाँ बना सपना जश्न से ज़्यादा इम्तिहान के क़रीब बैठता है।


