एक ही ब्योरे पर बँट जाने वाली तस्वीर, कि कोई सुन रहा था या नहीं, और उस लकीर के दो तरफ़ राहत और सुने जाने का सवाल बैठे हैं।
गाने के साथ वह ब्योरा आता है जो ज़्यादातर सपने नहीं देते, क्योंकि देखने वाला लगभग हमेशा बता सकता है कि कोई सुन रहा था या नहीं। पाठ इसी पर लगभग पूरा वज़न रखते हैं। अकेले गाने को छूट मिलने की तरह देखा जाता है, और उस बात की तरह जो देखने वाला रोज़ की बोली में नहीं कह रहा। सुनने वाले सामने हों तो वही तस्वीर सुने जाने के सवाल में बदल जाती है, और इस बात में कि वह मौक़ा कैसा गुज़रा।
गाड़ी में, रसोई में या ख़ाली घर में गाना उन सपनों में है जिन्हें सुनाने वाले सीधे-सीधे सुहाना बताते हैं, और पढ़ने वाले उसमें ज़्यादा उलझन नहीं डालते। मंच पर गाना दूसरी बात है। आवाज़ का साथ छोड़ देना, गीत का शुरू ही न होना, सुनने वालों का उठकर चले जाना: ये सब खुल जाने वाली सामग्री से जुड़ते हैं और अकसर उस दौर के साथ आते हैं जब काम पर किसी की परख हो रही हो। जिन क़िस्सों में सब ठीक चलता है उन्हें उस भरोसे का सबूत माना जाता है जिसका ख़ुद देखने वाले को पता नहीं था।
बहुत सारे लोग ऐसी धुन लेकर जागते हैं जिसे वे कहीं रख नहीं पाते, और कभी-कभी उन्हें यक़ीन होता है कि उन्होंने ही उसे बनाया। संगीतकारों ने इस तरह सचमुच के गीत लिखने की बात कही है, और सीधी समझ यही है कि नींद सुनी हुई चीज़ों को नए सिरे से जोड़ती है, शून्य से बनाती नहीं। तस्वीर के तौर पर इसे आमतौर पर ऐसी चीज़ के ऊपर आने से जोड़ा जाता है जिसे देखने वाले ने जान-बूझकर नहीं जोड़ा था। धुन का जागने के बाद भी बजते रहना आम बात है और ख़ुद में कोई ख़ास वज़न नहीं रखती।
मंडली, सभा या भीड़ का साथ गाना अपनेपन के साथ जाता है। उसमें शामिल हो जाना किसी समूह में अपनी जगह क़बूल करने की तरह देखा जाता है। सबके गाते रहते हुए ख़ुद सुर न पकड़ पाना उलटी बात कहता है, और सुनाने वाले फ़ौरन जान जाते हैं कि दोनों में से कौन सा उनके साथ हुआ।
यहाँ सबसे दूर तक निजी इतिहास जाता है। अगर तुम्हें बचपन से यही सुनाया गया है कि तुम्हें गाना नहीं आता, तो सपना वह फ़ैसला साथ लेकर चल रहा है, और कोश का अर्थ उसके बाद आता है।


