छोटा, तेज़ और ज़रा सी आहट पर चौंक जाने वाला जानवर, जिसे परंपरा ने बढ़ोतरी, थोड़ी सी क़िस्मत और कहीं टिक न पाने वाली बेचैनी से जोड़ा है।
खरगोश सपने में ठीक वैसे आता है जैसे खेत में आता है: ज़मीन से लगा हुआ, बिना आवाज़, और जिस पल जाने का मन बना ले उसी पल ग़ायब। सपने पढ़ने की पुरानी परंपरा ने इस जानवर को बढ़ती हुई चीज़ों के साथ रखा है, और उस फुर्ती के साथ जो कहीं देर तक नहीं ठहरती। यूरोप की पुरानी किताबों में थोड़ी सी क़िस्मत भी जुड़ी मिलती है, खरगोश के पैर को शुभ मानने वाला रिवाज़ वहीं से आया, पर वह रिवाज़ हर इलाक़े का नहीं है।
पाठ का ज़्यादातर बोझ दो बातें उठाती हैं। पहली, खरगोश की तादाद तेज़ी से बढ़ती है, इसलिए यह दृश्य बढ़ोतरी की गिनती में आता है: एक साथ शुरू हुए कई काम, या वह घर जो पहले से भरा-भरा लगने लगा हो। दूसरी, यह जानवर लड़कर नहीं, दौड़कर बचता है। इसीलिए फुदककर भागते खरगोश को ख़तरा नहीं, ख़तरे से दूर रहने की आदत माना गया।
रंग ने अपनी अलग कहानियाँ जोड़ी हैं। सफ़ेद खरगोश को अक्सर सीधा और पीछे चलने लायक़ बताया जाता है, पर यह जोड़ किसी बहुत पुरानी किताब से नहीं, पिछली सदी की बच्चों की कहानियों से आया है। गहरे रंग वाले खरगोश पर कुछ इलाक़ों में ज़्यादा सतर्क नज़र रही है और कई जगह उसमें कोई फ़र्क़ ही नहीं माना जाता।
ऊपर की कोई बात उस जानवर से ऊपर नहीं जो तुम्हारे भीतर पहले से चला आ रहा है। जिसने खरगोश पाले हैं, या जिसकी क्यारी हर बसंत में उजड़ती रही, वह रात में अपना ही खरगोश देखता है, और वह अजनबियों से इकट्ठा की गई सूची से कहीं ज़्यादा बताता है। सबसे सादा वजह भी टटोल लेनी चाहिए: उस हफ़्ते सचमुच कोई खरगोश दिखा हो, बच्चे को तस्वीरों वाली किताब पढ़ाई हो, या दुकान में रखा खिलौना नज़र में अटक गया हो।


