कमरों को ज़िंदगी के उन हिस्सों की तरह पढ़ा जाता है जो अलग-अलग रखे गए हैं, इसीलिए अनजाना कमरा मिलने का सपना लोगों को इतना भाता है।
इस सपने का एक रूप बार-बार लौटता है: तुम उस घर में हो जिससे बहुत अच्छी तरह वाक़िफ़ हो, हमेशा से मौजूद एक दरवाज़ा तुम्हारे हाथ से खुलता है, और उसके पीछे ऐसा कमरा है जो पहले कभी नहीं देखा। लोग ज़्यादातर घबराकर नहीं, ख़ुश होकर जागते हैं, और पुराना पाठ भी उसी मूड से मेल खाता है। कमरे को ज़िंदगी के उस हिस्से की निशानी माना जाता है जिसे बाक़ी से अलग रखा गया हो, इसलिए अनजाना कमरा गुंजाइश कहलाता है: कोई शौक़ या अपना ही कोई पहलू जो खोया नहीं, बस बंद पड़ा था।
वजह बनावट में है। रहने की जगह अपने कामों को दीवारों से बाँटती है: सोने की जगह, पकाने की जगह, मेहमान बिठाने की जगह, और वह कोना जहाँ रखी चीज़ों को साल भर कोई नहीं देखता। अर्थ लगाने वालों ने इसी बँटवारे को इस बात की तस्वीर बनाया कि लोग अपनी ज़िंदगी के हिस्से किस तरह अलग-अलग रखते हैं, और सपना जिस कमरे से शुरू होता है उसे आमतौर पर इस वक़्त चल रहा हिस्सा माना जाता है। एक कमरे से दूसरे में जाना भूमिकाएँ बदलने की तरह लिया जाता है, इसीलिए नौकरी, घर या देश बदलते वक़्त यह दृश्य इतना आता है।
बचपन का कमरा, वह फ़्लैट जो सालों पहले छूट गया, किसी ऐसे इंसान का कमरा जिससे अब बात नहीं होती: ये पूरा दौर साथ लेकर आते हैं और फ़र्नीचर नहीं, वही दौर पढ़ा जाता है। एक ही नक़्शे वाले घर से ख़ुशहाल और नाख़ुश परिवार बिलकुल अलग सपने बनाते हैं, इसलिए उन दीवारों का तुम्हारे लिए क्या मतलब था, यह कमरों के आम पाठ से पहले आता है। जहाँ किताब और याद अलग बात कहें, वहाँ सपना याद ही देख रही होती है।


