यह ख़ुद प्रतीक नहीं, वह कब्ज़ा है जिस पर सपना घूमता है, और पाठ इस पर बनता है कि वह खुला या नहीं और तुम दरवाज़े के किस तरफ़।
दरवाज़ा अकेले में शायद ही कभी असल बात होता है; वह वही कब्ज़ा है जिस पर पूरा सपना घूमता है। आम व्याख्या इसे चुनाव, दहलीज़ या मौक़ा बनाती है, और सारा मतलब इसी पर टिका रहता है कि वह खुल गया या नहीं, जबकि सपनों की रिपोर्टें ऐसे दरवाज़ों से भरी हैं जो अटक जाते हैं, जो किसी नामुमकिन जगह खुलते हैं, और जिन तक देखने वाला कभी ठीक से पहुँच ही नहीं पाता। घर को बड़े पैमाने पर ख़ुद इंसान की तस्वीर पढ़ा जाता है, इसीलिए उसके भीतर के दरवाज़े इतना ध्यान खींचते हैं।
दरवाज़े पर कोई खड़ा हो तो पाठ बाहर की तरफ़ खिंच जाता है, दूसरे लोगों और उनकी माँगों की तरफ़। दरवाज़ा खोलना खुलेपन की तरह लिया जाता है और दस्तक अनसुनी कर देना उसके उलट, हालाँकि दोनों में कोई फ़ैसला नहीं सुनाया जाता। ख़ुद बाहर खड़े होकर दस्तक देना वह सूरत है जिसे लोग सबसे असहज बताते हैं, और उसे किसी चीज़ के भीतर लिए जाने की चाह से जोड़ा जाता है: कोई परिवार, कोई भूमिका, या वह बातचीत जो तुम्हारे पहुँचते ही बंद हो जाती है।
यह पूछो कि वह ख़ास दरवाज़ा असल में था क्या, क्योंकि जागती ज़िंदगी का पहचाना हुआ दरवाज़ा अपनी पूरी कहानी घसीटकर साथ लाता है। जिस घर में तुम्हारी परवरिश हुई उसका मुख्य दरवाज़ा मौक़े का कोई आम चिह्न नहीं है; वह वही घर है। दरवाज़ा सचमुच अनजाना हो तो पुराने पाठ को खुलकर काम करने की जगह मिलती है, और तब भी उसके सामने तुम्हारा अपना एहसास दरवाज़े से ज़्यादा बताएगा।


