रोज़मर्रा की बोली इस तस्वीर तक पहले पहुँची, पुराने घाव और चुभती बात के साथ। परंपरा इसे उठाई हुई तकलीफ़ मानती है, शरीर की कोई ख़बर नहीं।
रोज़मर्रा की ज़बान इस तस्वीर तक किसी सपनों की किताब से बहुत पहले पहुँच गई थी। लोग पुराने घावों की बात करते हैं, किसी चीज़ के फिर से हरा हो जाने की, ऐसी बात की जो चुभ गई, और सपने में घाव की पुरानी व्याख्या ठीक इसी लकीर पर चलती है: वह तकलीफ़ जो भरने तक नहीं पहुँची। इसे देखने वाले का उठाया हुआ बोझ माना जाता है, शरीर के बारे में कोई ख़बर नहीं।
इन पाठों को उम्र की परवाह है। ताज़ा, बहता हुआ ज़ख़्म ऐसी तकलीफ़ माना जाता है जो अभी की है और रोज़ महसूस हो रही है। पुराना घाव जो दोबारा खुल जाए, उसे वह बात माना जाता है जिसे देखने वाला ख़त्म समझ चुका था और जिसे किसी मिलती-जुलती हालत ने वापस ला दिया। भरता हुआ घाव, या ऐसा घाव जिस पर कोई और पट्टी बाँध रहा हो, आमतौर पर देखभाल क़बूल कर लेने का दृश्य माना जाता है, और बहुत से लोग कहते हैं कि तस्वीर का यही आधा हिस्सा उन्हें ज़्यादा मुश्किल लगता है।
यह बात सीधे कह देनी चाहिए। सपना जाँच का औज़ार नहीं है। चोट का सपना यह नहीं बताता कि तुममें या तुम्हारे किसी अपने में कुछ गड़बड़ है, और किसी को भी सपने को अपनी सेहत की फ़िक्र की वजह नहीं बनाना चाहिए, न ही किसी सचमुच के लक्षण के बारे में डॉक्टर से पूछना टालना चाहिए। रास्ता सिर्फ़ एक तरफ़ चलता है: रात में होने वाला असली दर्द या तकलीफ़ अक्सर दृश्यों में बदल जाती है, और यही वजह है कि चोट से उबरते लोग चोट के सपने ज़्यादा देखते हैं।
घाव कहाँ है, इससे ज़्यादातर लोगों के लिए तस्वीर का सुर बदल जाता है। हाथों को आमतौर पर काम और क़ाबिलियत से जोड़ा जाता है, चेहरे को इससे कि आदमी ख़ुद को दूसरों की नज़र में कैसा समझता है, पैरों को अपने बल पर खड़े होने से। और जिसे सचमुच कभी गहरी चोट लगी हो, वह वही याद भी साथ लेकर सोता है। उसके लिए यह सपना सिर्फ़ याद का रात वाला रोज़ का काम हो सकता है, और किसी निशानी वाले पाठ को उसके ऊपर बोलने देना ठीक नहीं।


