जो भी घड़ी देखकर जीता है उसे यह सपना आता है, और यह दबाव भरे दिनों के इतने पास-पास चलता है कि वजह अक्सर ख़ुद पकड़ में आ जाती है।
नींद की मशीनरी में कुछ है जो तय तारीख़ों पर जवाब देता है, और यह सपना उसी का नतीजा है। यह उन हफ़्तों में आता है जिनमें मुलाक़ातें, इम्तिहान, लॉन्च और रवानगी भरी हों, और पुराना पाठ सीधा है: बात यह नहीं कि तुमसे कुछ छूट जाएगा, बात यह है कि तुम्हें मौक़ा निकल जाने के बाद पहुँचने का डर है।
इस सपने के दृश्य उन लोगों के बीच भी हैरान करने वाली हद तक मिलते-जुलते हैं जो कभी एक-दूसरे से मिले नहीं। छूटती हुई ट्रेन, इम्तिहान का वह कमरा जहाँ पर्चा शुरू हो चुका है, वह शादी जहाँ तुम्हारा पहुँचना रस्म के बाद होता है, और वह जहाज़ जिसका दरवाज़ा बंद हो गया। व्याख्या करने वाले जगह के चुनाव को ही सुराग़ मानते हैं: जिसके लिए देर हो रही है वह अक्सर उसी चीज़ का रूप होती है जिसके लिए तुम्हें अपनी तैयारी पूरी नहीं लगती।
ऐसी रुकावटें भी इसी ढाँचे का हिस्सा हैं जिनका दिन की रोशनी में कोई तुक नहीं बनता। जूते जो पैर में जाते ही नहीं, गलियारा जो लंबा होता जाता है, गाड़ी जो चालू नहीं होती, चाबियाँ जो बढ़ती चली जाती हैं। इन्हें हालात के अड़ जाने का एहसास कहा जाता है, तुम्हारी क़ाबिलियत पर कोई फ़ैसला नहीं।
इम्तिहान के मौसम वाले छात्र, नए बने माँ-बाप, सुबह की उड़ान पकड़ने वाले और वे लोग जिनकी नौकरी में शिफ़्ट का वक़्त तय है, इसे भरपूर बताते हैं, और यही सादे पाठ को किसी भी घुमावदार पाठ से ऊपर रखता है। जिसकी बीस साल में एक ट्रेन नहीं छूटी और जो हर वक़्त ट्रेन छूटने के डर में जीता है, दोनों यहाँ बिलकुल अलग सामान लेकर खड़े हैं, और दूसरा इस सपने को पहली नज़र में पहचान लेगा।
यह किसी ख़ास मुलाक़ात के बारे में चेतावनी नहीं है। पुरानी व्याख्या की परंपराएँ दबाव के लिए भाषा देती हैं, आगे का नज़ारा कभी नहीं, और इस सपने को किसी असली उड़ान छूटने की पेशगी ख़बर समझना उसे पूरी तरह ग़लत पढ़ना है। अगर यह इतनी बार लौटे कि नींद टूटने लगे, तो काम की बात उस दबाव पर है जिसमें तुम्हारे दिन कट रहे हैं, निशानी पर नहीं।


