हर उम्र में आम, और किसी के गुज़र जाने के बाद तो और भी ज़्यादा, और परंपराओं में इसे तुम्हारे पीछे खड़ी क़तार की तरह पढ़ा जाता है।
घर के बड़ों को जगह देने वाली ज़्यादातर परंपराएँ दादा या नाना को तुम्हारे पीछे खड़ी क़तार का रूप मानती हैं: विरासत में मिला मिज़ाज, पुराना रौब, और वे नियम जो तुम्हारे आने से पहले ही घर में लागू थे। वे ज़िंदा हों या गुज़रे हुए, सपने में उतनी ही आसानी से आते हैं, और उनके आने को न सेहत की ख़बर माना जाता है न उम्र की, ख़ुद उनकी भी नहीं। यह बात शुरू में ही कह देनी ज़रूरी है, क्योंकि किसी के गुज़र जाने के बाद वाले हफ़्तों में ये सपने इतनी बार आते हैं कि लोगों को शक होने लगता है।
अंग्रेज़ी के एक शब्द के मुक़ाबले यहाँ दो अलग लोग हैं, दादा और नाना, और घरों में इनकी जगह भी एक जैसी नहीं रही। कई परिवारों में दादा अनुशासन और ज़मीन-जायदाद वाली क़तार में आते हैं, जबकि नाना का घर वह जगह रहा है जहाँ छुट्टियों में सारी छूट मिलती थी। रात में इनमें से कौन आया, इसी हिसाब से पाठ भी बदल जाता है, इसलिए किसी आम पन्ने पर जाने से पहले यह तय कर लेना काम आता है।
पढ़ने वाले सपने के बुज़ुर्ग को हुक्म नहीं, सलाह मानते हैं। वे ऐसे मोड़ों पर दिखते हैं जहाँ कोई फ़ैसला तौला जा रहा हो, और बताने वाले अक्सर कहते हैं कि उन्होंने बहुत कम बोला, या एक सीधी सी बात कही जो कई दिन याद रही। जहाँ जागती ज़िंदगी का रिश्ता गरम रहा हो, वहाँ पाठ सहारे और सिलसिले की तरफ़ जाता है। जहाँ रिश्ता दूर या कड़वा रहा हो, वहीं यही आकृति घर के अधूरे हिसाब में गिनी जाती है, और इनमें कोई सपना दूसरे से बेहतर नहीं होता।
यहाँ कोई आम पाठ एक ठोस याद के सामने नहीं टिकता। जिसे दादा ने पाला हो वह सपने में एक माँ-बाप को देख रहा है, कोश उसे जिस भी ख़ाने में रखे। जो उनसे दो बार मिला हो वह एक तस्वीर देख रहा है। किसी सूची पर नज़र डालने से पहले याद करो कि वह इंसान तुम्हारे घर में क्या था और तुम दोनों के बीच क्या अनकहा रह गया, क्योंकि यह सपना उन्हीं यादों से बनता है।


