सपने में पिता को देखना

एक पाठ में हिफ़ाज़त, दूसरे में दबाव। दोनों इसलिए टिके हैं कि सपना देखने वाले ख़ुद इस आदमी को दोनों तरह बताते हैं, अक्सर एक ही बरस के भीतर।

सपनों की दुनिया में शायद ही कोई और आदमी इतने उलटे ढंगों से पढ़ा जाता हो जितना पिता। एक लंबी परंपरा उसमें हिफ़ाज़त, अधिकार और विरासत में मिले नियम देखती है, दूसरी उसके आने को दबाव, उम्मीद और किसी पैमाने पर नापे जाने की तरह लेती है। दोनों इसलिए ज़िंदा हैं कि सुनाने वाले ख़ुद इस आदमी को दोनों रंगों में बताते हैं।

पुरानी किताबों की समझ

पुराने कोशों में पिता ढाँचे की जगह खड़ा होता है, यानी ज़िंदगी का वह हिस्सा जो ज़िम्मेदारी, इंतज़ाम और हदों से बना है। शांत पिता को उस ढाँचे के अपनी जगह टिके रहने की तरह लिया जाता था, और नाराज़ या ग़ैरहाज़िर पिता को उसी ढाँचे पर उठे सवाल की तरह। आज के व्याख्याकार इसी तस्वीर को अक्सर भीतर बैठी हुई उस आवाज़ से बातचीत की तरह कहते हैं जो सही-ग़लत तय करती है, चाहे वह आवाज़ किसी ने भी वहाँ रखी हो।

जब पिता अब नहीं रहे

गुज़र चुके माता या पिता के सपने बेहद आम हैं और अक्सर बहुत साफ़ होते हैं। यह कोश जिन व्याख्याओं की ज़िम्मेदारी ले सकता है, उनमें से कोई भी इन्हें मुलाक़ात या संदेश नहीं मानती। लोग सबसे ज़्यादा इनके सादेपन का ज़िक्र करते हैं: रसोई, गाड़ी का कोई सफ़र, बिना मतलब की बातचीत। शोक पर काम करने वाले बताते हैं कि ऐसे सपने अक्सर तसल्ली देते हैं और बरसी के आसपास लौट-लौटकर आते हैं। बहुत से लोगों को यह ढाँचा प्रतीक वाले पाठ से ज़्यादा काम का लगता है।

आदमी से बड़ी उसकी भूमिका

यह देखना काम का है कि सपने वाले आदमी ने बर्ताव भी तुम्हारे पिता जैसा किया था या नहीं। लोग अक्सर बताते हैं कि चेहरा किसी अजनबी का था, या कोई अजनबी था जिसके बारे में सपने में पक्का पता था कि यही पिता है, और परंपरा इस फ़ासले को आदमी की नहीं, भूमिका की बात मानती है।

कोई कोश यह तय नहीं कर सकता कि पिता का मतलब क्या है, क्योंकि यह शब्द किसी प्रतीक से बहुत पहले ही अपना पूरा बोझ लेकर पहुँच चुका होता है। जो गरम और मौजूद पिता के साये में बड़ा हुआ और जिसने अपने पिता को कभी देखा ही नहीं, ये दोनों एक तस्वीर नहीं देख रहे, और इस पन्ने को ज़िंदगी के हिसाब से झुकना चाहिए, उलटा नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मैंने देखा कि पिता मुझसे नाराज़ हैं। क्या बात उन्हीं की है?
ज़रूरी नहीं। व्याख्याकार आमतौर पर इस आदमी को अधिकार और फ़ैसले की जगह खड़ा मानते हैं, जिसका ख़ुद उन्हीं से कोई लेना-देना न हो। यह मान लेने से पहले कि सपना घर के बारे में है, यह सोचो कि पिछले दिनों तुम्हें कौन परख रहा था।
पिता को गुज़रे बरसों हो गए, फिर भी सपने में क्यों आते हैं?
गुज़र चुके माता-पिता के लौट-लौटकर आने वाले सपने बहुत लोग बताते हैं, और ये दशकों तक चल सकते हैं बिना यह बताए कि कुछ अनसुलझा पड़ा है। ये अक्सर जन्मदिन और बदलाव के दिनों के आसपास इकट्ठे हो जाते हैं। ज़्यादातर लोग इन्हें दुख से ज़्यादा मीठा-कड़वा बताते हैं।

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