सपने में अपना चेहरा देखना

शीशे में जो चेहरा दिखा वह लगभग तुम्हारा था और पूरा तुम्हारा नहीं। इस हल्की सी गड़बड़ को परंपरा सूरत का नहीं, अपनी छवि का सवाल मानती है।

जो लोग यह सपना सुनाते हैं, उनकी बात में एक चीज़ बार-बार लौटती है: शीशे में जो चेहरा दिखा वह लगभग उन्हीं का था, पर ठीक-ठीक उन्हीं का नहीं। सपनों की परंपरा में अपना चेहरा उस छवि का सवाल माना जाता है जो दुनिया के सामने तुमसे बनती है, और यह कि वह छवि अब भी तुम पर ठीक बैठती है या नहीं।

पुराने कोश इस दृश्य को उसकी हालत से तौलते थे। साफ़ और जाना-पहचाना चेहरा ठहरी हुई पहचान का पाठ पाता था, धुँधला, बुझा या बदला हुआ चेहरा उलझन के दौर का। यह पढ़ने की एक पुरानी आदत है, कोई खोज नहीं, और चेहरे का कोई सपना तुम्हारी असली सूरत या सेहत के बारे में कुछ नहीं बताता।

लोग किन-किन रूपों में बताते हैं

  • चेहरा जो टिकता ही नहीं। यह अक्सर उन महीनों में सुनाया जाता है जब सब कुछ हिल रहा हो: नई नौकरी, नया शहर, किसी लंबी चीज़ का ख़त्म होना।
  • अपनी जगह किसी और का चेहरा। एक प्रचलित पाठ इसे उस भूमिका से जोड़ता है जो तुम्हें थमा दी गई हो, तुमने चुनी न हो।
  • शीशे में परछाईं ही नहीं। यह उन लोगों से ज़्यादा सुनने को मिलता है जो किसी एक जगह पर ख़ुद को अनदेखा महसूस करते हैं।
  • चेहरा धोना, ढकना या रंग देना। कई पाठों में इसमें नई शुरुआत की चाह पढ़ी गई है, या देखे जाने से थोड़ी देर की छुट्टी की चाह।

शीशा बीच में क्यों आ जाता है

अपना चेहरा भीतर से याद करना मुश्किल काम है। तुम्हें वह शीशे, तस्वीरों और स्क्रीन के रास्ते ही मिलता है, इसलिए सपना अक्सर देखने के लिए कोई सतह पकड़ा देता है। कुछ लोग बताते हैं कि परछाईं ज़रा देर से हिली, या उस पर ऐसा भाव था जो उन्होंने बनाया ही नहीं था, और सुबह तक यही बेमेल साथ रह जाता है।

चेहरों का सपने में डगमगाना कोई रहस्य नहीं है। नींद के दौरान बारीक दृश्य याद कमज़ोर पड़ जाती है और चेहरे सबसे पहले पिघलते हैं। पुराना प्रतीक वाला पाठ और यह सीधी वजह, दोनों एक-दूसरे को काटे बिना साथ बैठ जाते हैं।

पहले अपनी जगह से नापो

जिसका दाँत का इलाज अभी-अभी हुआ हो, जिसकी रोज़ी कैमरे के सामने खड़े होने से चलती हो, और जो हफ़्तों शीशे की तरफ़ देखता तक न हो, इन तीनों के लिए यही तस्वीर एक चीज़ नहीं है। शुरुआत इससे करो कि देखे जाने के साथ तुम्हारा अपना रिश्ता कैसा है, फिर देखो कि ऊपर लिखी परंपरा उसमें कुछ जोड़ती भी है या नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सपने में मेरा चेहरा बदला हुआ क्यों था?
बदली या अनजानी सूरत इस सपने की सबसे ज़्यादा बताई जाने वाली बात है, और इसकी एक वजह यह है कि नींद में दृश्य याद ढीली रहती है। जहाँ परंपरा इस बदलाव को पढ़ती भी है, वहाँ वह पहचान की बात मानी जाती है, सूरत की नहीं। दोनों में से किसी पाठ के लिए ज़रूरी नहीं कि सपना तुम्हारे शरीर के बारे में कुछ कह रहा हो।
चेहरे पर घाव या निशान देखना क्या बुरा शगुन है?
कोई भी दृश्य शगुन की तरह काम नहीं करता, और गिनने लायक़ किसी परंपरा में यह तस्वीर आने वाले वक़्त की ख़बर नहीं मानी जाती। जहाँ इसे पढ़ा जाता है वहाँ बात खुल जाने या परखे जाने के एहसास की होती है, किसी घटना की नहीं। अगर इससे मन बेचैन हुआ तो ज़्यादा काम का सवाल यह है कि पिछले हफ़्तों में यह किस बात की गूँज लगती है।

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