शीशे में जो चेहरा दिखा वह लगभग तुम्हारा था और पूरा तुम्हारा नहीं। इस हल्की सी गड़बड़ को परंपरा सूरत का नहीं, अपनी छवि का सवाल मानती है।
जो लोग यह सपना सुनाते हैं, उनकी बात में एक चीज़ बार-बार लौटती है: शीशे में जो चेहरा दिखा वह लगभग उन्हीं का था, पर ठीक-ठीक उन्हीं का नहीं। सपनों की परंपरा में अपना चेहरा उस छवि का सवाल माना जाता है जो दुनिया के सामने तुमसे बनती है, और यह कि वह छवि अब भी तुम पर ठीक बैठती है या नहीं।
पुराने कोश इस दृश्य को उसकी हालत से तौलते थे। साफ़ और जाना-पहचाना चेहरा ठहरी हुई पहचान का पाठ पाता था, धुँधला, बुझा या बदला हुआ चेहरा उलझन के दौर का। यह पढ़ने की एक पुरानी आदत है, कोई खोज नहीं, और चेहरे का कोई सपना तुम्हारी असली सूरत या सेहत के बारे में कुछ नहीं बताता।
अपना चेहरा भीतर से याद करना मुश्किल काम है। तुम्हें वह शीशे, तस्वीरों और स्क्रीन के रास्ते ही मिलता है, इसलिए सपना अक्सर देखने के लिए कोई सतह पकड़ा देता है। कुछ लोग बताते हैं कि परछाईं ज़रा देर से हिली, या उस पर ऐसा भाव था जो उन्होंने बनाया ही नहीं था, और सुबह तक यही बेमेल साथ रह जाता है।
चेहरों का सपने में डगमगाना कोई रहस्य नहीं है। नींद के दौरान बारीक दृश्य याद कमज़ोर पड़ जाती है और चेहरे सबसे पहले पिघलते हैं। पुराना प्रतीक वाला पाठ और यह सीधी वजह, दोनों एक-दूसरे को काटे बिना साथ बैठ जाते हैं।
जिसका दाँत का इलाज अभी-अभी हुआ हो, जिसकी रोज़ी कैमरे के सामने खड़े होने से चलती हो, और जो हफ़्तों शीशे की तरफ़ देखता तक न हो, इन तीनों के लिए यही तस्वीर एक चीज़ नहीं है। शुरुआत इससे करो कि देखे जाने के साथ तुम्हारा अपना रिश्ता कैसा है, फिर देखो कि ऊपर लिखी परंपरा उसमें कुछ जोड़ती भी है या नहीं।


