हर उम्र और हर संस्कृति में बताया जाने वाला सपना, और सेक्स से इसका रिश्ता बहुत कम। सबसे तीखा ब्योरा यह है कि बाक़ी लोगों ने कितनी कम परवाह की।
इस सपने के बारे में पहली बात यही है कि इसका सेक्स से नाता बहुत कम है। सबके बीच बिना कपड़ों के खड़ा होना दुनिया भर में सबसे ज़्यादा बताए जाने वाले दृश्यों में है, हर संस्कृति और हर उम्र में मिलता है, और परंपरा इसे खुल जाने की तरह पढ़ती है: जैसे हो वैसे ही देख लिए जाने का डर, बिना उस तैयारी के जो आमतौर पर साथ रहती है। दूसरी बात लोग एक-दूसरे से मिलाने पर पकड़ते हैं, कि सपने में अक्सर किसी को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा होता।
पूरा पाठ इसी ब्योरे पर टिका है। एक बहुत आम रूप में देखने वाला शर्म से गड़ा जा रहा है जबकि आसपास के लोग अपने काम में लगे हैं, और घबराहट तथा बेपरवाही के बीच की यही दूरी असल बात मानी जाती है: शर्म अकेले देखने वाले की है, कोई दूसरा उस पर मुहर नहीं लगा रहा। दूसरे रूप में लोग सचमुच घूरते हैं, जिसे परखे जाने के डर के पास रखा जाता है और अक्सर किसी असली हालत से जोड़ा जाता है जहाँ ख़ुद को जाँचा जाता महसूस हो। तीसरा रूप, जिसकी चर्चा कम है पर जो ख़ूब बताया जाता है, इस हालत में पूरी तरह सहज महसूस करना है, और उसे उस राहत से जोड़ा जाता है जब निभाने को कुछ बचा ही न हो।
यह तस्वीर देखने वाले के शरीर पर, उसके चरित्र पर या उसकी निजी ज़िंदगी पर कोई टिप्पणी नहीं है, और इसे उस तरह पढ़ने से बरसों बेवजह की शर्मिंदगी फैली है। हद संस्कृति भी तय करती है, क्योंकि खुल जाना किसे कहेंगे यह एक जगह से दूसरी जगह बदल जाता है। आख़िरी बात उसी की है जिसने सपना देखा। जो रोज़ सुबह तालाब पर सौ लोगों के बीच कपड़े बदलता है, उसके लिए खुल जाने का मतलब वह है ही नहीं जो उसके लिए जिसके यहाँ परदा हमेशा क़रीब से निभाया गया।


