गिने-चुने उन जानवरों में से एक जिसका परंपरा वाला अर्थ जगह बदलते ही उलट जाता है, इसलिए यहाँ तुम्हारी अपनी पहली प्रतिक्रिया सबसे काम की चीज़ है।
हिंदी में छोटे और बड़े, दोनों को चूहा ही कह देते हैं, पर सपनों की किताबों में बड़ा चूहा हमेशा भारी वाला रूप रहा है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कोश इसे कीट की तरह लेते आए हैं: अनाज का ख़राब होना, शक, और दीवार के भीतर चलती वह गड़बड़ जिसे किसी ने अब तक हाथ नहीं लगाया। चीनी राशिचक्र में यही जीव 12 साल के चक्र को खोलता है और चतुराई, जुगाड़ और सबसे पहले पहुँच जाने का नाम है, तो जो उस माहौल में बड़ा हुआ उसे रात में बिलकुल दूसरा जानवर मिलता है।
पश्चिमी लकीर में कोई रहस्य नहीं है। चूहे रखे हुए अनाज के ख़राब होने से जुड़े रहे, बीमारियों के फैलाव से जुड़े रहे, और इस खोज से भी कि कुछ बहुत दिनों से नज़र के नीचे चुपचाप चल रहा था। आख़िरी वाली बात सबसे टिकाऊ निकली। हिंदी में "दाल में कुछ काला" जैसी बात इसीलिए बनी कि ऐसे जीव उस शक का छोटा नाम बन जाते हैं जो साबित अभी नहीं हुआ, और सपने की रसोई या तहख़ाने में चूहा ज़्यादातर वही लोग बताते हैं जिन्हें लगता है उनके नीचे कुछ पक रहा है।
इससे यह नहीं निकलता कि सपना किसी ख़ास इंसान के बारे में सबूत है। रात की एक तस्वीर को किसी और के बर्ताव का प्रमाण मान लेना बिना वजह रिश्ता बिगाड़ने का पक्का तरीक़ा है।
दूसरी परंपरा भी उतनी ही पुरानी है। कई इलाक़ों की लोक कथाओं में चूहा जीतने वाला किरदार है, जो अपने से बड़े और ताक़तवर जानवरों को सिर्फ़ इसलिए मात दे देता है कि वह उनसे ज़्यादा ध्यान से देखता है। बाद में प्रयोगशालाओं ने इसी जीव को सीखने और हालात से ढल जाने का पर्याय बना दिया, बिलकुल अलग सुर में। जहाँ यही जोड़ भीतर बैठा हो, वहाँ वही सपना सड़ांध नहीं, दबाव में टिके रहने की समझदारी कहलाता है।
जो चूहे पालता है उसे रात में एक जिज्ञासु, दोस्त जैसा जीव मिलता है। जिसने किराए के मकान में उनकी फ़ौज से लड़ाई लड़ी है उसे कुछ और ही मिलता है, और कोई किताब बाहर से इन दोनों में फ़र्क़ नहीं कर सकती। भरोसे का सवाल यही है कि चूहे के रहते तुम्हें भीतर क्या लगा: घिन, डर, बेपरवाही, या शायद थोड़ा लगाव। सादा वजह भी पहले हटा देनी चाहिए, जैसे उस हफ़्ते सचमुच कोई चूहा दिखना, कोई वृत्तचित्र, या बग़ल में चलती तोड़फोड़।


