बाज़ का सपना सुनाने वाले पंखों की नहीं, ऊँचाई की बात करते हैं, और परंपरा इसी ऊँचाई को दूरी, हौसले और पूरी तस्वीर देख लेने की चाह से जोड़ती है।
बाज़ सपने में पास से मिलने वाला जानवर नहीं होता, वह आसमान में एक दूर की आकृति बनकर याद रह जाता है। दुनिया की ज़्यादातर व्याख्या परंपराएँ इस पक्षी को नज़र और हौसले के साथ रखती हैं: किसी उलझन को उसके भीतर से नहीं, बहुत ऊपर से देख लेने की चाह। यूरोप और मध्य एशिया के पुराने संग्रह इसमें रुतबा भी जोड़ते हैं, और शायद इसीलिए यह पक्षी इतने झंडों, सिक्कों और निशानों पर जा बैठा। इनमें से कोई पाठ आने वाले दिन की ख़बर नहीं देता, वह सोचने की शुरुआत भर है।
किसी से उसका बाज़ वाला सपना पूछो तो वह पंखों का ज़िक्र शायद ही करेगा। वह ऊँचाई बताएगा: पक्षी कितना ऊपर था, तुमने उसे नीचे से देखा या किसी तरह ख़ुद को वहीं ऊपर पाया, और ज़मीन कितनी छोटी दिख रही थी। पुराने पाठ ठीक इसी ब्योरे पर टिके हैं। बाज़ को उस नज़र का रूप माना गया जो किसी काम के भीतर बैठकर नहीं मिलती, और यही वजह है कि यह दृश्य अक्सर उन लोगों को आता है जो महीनों से एक ही मामले में नाक तक धँसे हों।
जिसने परिंदों को क़रीब से देखा हो, जो शिकारी पक्षियों के बीच पला हो, या जिसके शहर में यह पक्षी किसी निशान की तरह हर जगह टँगा हो, वह इस सपने पर सादा ज़मीन से नहीं आता। उसके लिए पक्षी पहले से एक निजी कहानी लेकर चलता है, और असली रंग वही कहानी तय करती है, कोई कोश नहीं। अगर तुम्हारे सपने का बाज़ किसी दूर की ताक़त से ज़्यादा एक जाने-पहचाने साथी जैसा लगा, तो तुम्हारे लिए सही पाठ वही है जो इसी एहसास से शुरू हो।


