विषय कम, चौखट ज़्यादा, और यही वजह है कि पढ़ने वालों ने उसके होने से नहीं, उसकी हालत से हमेशा ज़्यादा मतलब रखा।
सपना शायद ही कभी आसमान के बारे में होता है। वह वह पर्दा है जो देखने वाले को बताता है कि उसके नीचे जो कुछ चल रहा है उसे कैसा लगना चाहिए, और पुराने पाठ भी उसकी मौजूदगी को छोड़कर पूरी तरह उसकी हालत पर टिके रहते हैं: खुला, नीचा, चोट खाया हुआ, बेहद ऊँचा, या ऐसे रंग का जो होता ही नहीं।
खुला नीला आसमान वह रूप है जिसे सबसे लगातार भला माना गया है, और पाठ आमतौर पर क़िस्मत की नहीं, जगह और गुंजाइश की भाषा में बात करते हैं। नीचे झुका या दबाता हुआ आसमान बंदिश का रूप माना जाता है, और सुनाने वाले बिना पूछे छत जैसे शब्द ख़ुद उठा लेते हैं। जो आसमान देखते-देखते बदलता रहे वह डाँवाडोल हालत वाली तस्वीरों में शामिल होता है, और पढ़ने वाले पूछते हैं कि हाल में किस चीज़ का भरोसा टूटा है।
जो रूप सबसे साफ़ याद रह जाते हैं उनमें आसमान अकसर ग़लत बरताव करता है: दो सूरज, हद से बड़ा चाँद, उस पर पड़ी दरार, या यह एहसास कि वह नीचे आ रहा है। पुरानी सामग्री इन्हें पूरे इलाक़े से जुड़े शगुन मानती थी, किसी एक आदमी से नहीं। आज के पाठ नज़र दोबारा भीतर मोड़ लेते हैं और उन्हें इस एहसास की तरह लेते हैं कि कोई बुनियादी चीज़ खिसक गई है। इनमें से कोई भी रूप आगे की घटना नहीं बताता।
हरकत ख़ुद भी एक पाठ रखती है। जिन सपनों में आसमान पर नज़र जाती है उनमें देखने वाला आमतौर पर रुककर ऊपर देखता है, और उस ठहराव को अकसर पूरी तस्वीर का ज़्यादा मानी वाला आधा हिस्सा माना जाता है।
एक बात इन सब पर भारी पड़ती है। जिस जगह तुम्हारी परवरिश हुई, दिमाग़ उसी जगह का आसमान उठाता है, और लंबी उत्तरी रोशनी में बीता बचपन वैसी तस्वीर नहीं बनाता जैसी वहाँ बनती है जहाँ रात एकदम से उतर आती है।


