हकीक, जिसे अंग्रेज़ी में एगेट कहा जाता है, प्रकृति में सबसे अधिक विविधता वाले पत्थरों में से एक है। यह लाल, भूरे, सलेटी, दूधिया सफ़ेद, नीले और हरे रंगों में मिलता है और इसकी सबसे पहचानी जाने वाली खूबी इसके भीतर बनी हुई गोलाकार धारियाँ हैं। ये परतें कहीं पारभासी होती हैं और कहीं लगभग पारदर्शी, जिससे एक ही पत्थर के भीतर कई शेड एक साथ दिखाई देते हैं।
इसका नाम सिसिली की उस अकाटेस नदी से जुड़ा माना जाता है, जिसके किनारे इसे सबसे पहले पहचाना गया था। भारतीय बाज़ारों में यह हकीक या सुलेमानी पत्थर के नाम से बिकता आया है और खंभात का इलाका सदियों से इसकी कटाई और पॉलिश का बड़ा केंद्र रहा है। यह पत्थर ज्वालामुखीय चट्टानों की खाली गुहाओं में धीरे-धीरे जमकर बनता है और खदान से निकालने के बाद इसे काटकर तराशा जाता है।
पुराने समय से हकीक सिर्फ़ गहनों तक सीमित नहीं रहा। इससे अंगूठियाँ, मालाएँ, मुहरें, कटोरियाँ और छोटी मूर्तियाँ बनाई जाती थीं, और मज़बूती के कारण यह पीढ़ियों तक चलता था। लोक विश्वास में इसे शांत करने वाला पत्थर माना जाता है और परंपरा कहती है कि यह तब सबसे अच्छा काम करता है जब त्वचा से सीधा स्पर्श करे।
हकीक पत्थर की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे पहनने वाले को अनजाने ख़तरों से बचाने वाला कवच माना जाता रहा है।
• लोक विश्वास में इसे नींद न आने की शिकायत और सुस्त पाचन के समय पास रखा जाता था।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह हालात को बिना अतिशयोक्ति के, जैसे हैं वैसे देखने में मदद करता है।
• इसे मज़बूत और भरी हुई ऊर्जा वाला पत्थर कहा गया है, जिसे दमखम और शारीरिक ताक़त से जोड़ा जाता रहा।
• माना जाता है कि हथेली में रखने पर यह अकड़ी हुई मांसपेशियों को ढीला छोड़ने का एहसास देता है।
• परंपरा में इसे जमा हुआ अतिरिक्त तनाव बाहर निकालने वाला पत्थर बताया गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह नए लोगों से घुलने-मिलने और अनजान माहौल में सहज होने में सहारा देता है।
• इसे हिम्मत बढ़ाने वाला पत्थर कहा जाता है, जो डर के सामने टिके रहने में मदद करता है।
• पुराने ग्रंथों में इसे साफ़ सोच और तर्क की पकड़ मज़बूत करने वाला बताया गया है।
• लोक परंपरा में इसे शरीर की सहनशक्ति और लसीका के बहाव से जोड़ा जाता रहा है।
• माना जाता है कि निम्न रक्तचाप की प्रवृत्ति वाले लोग इसे सहारे के तौर पर पास रखते थे।
• सदियों से इसे नज़र और बुरी नीयत से बचाव के लिए पहना गया, क्योंकि इसकी धारियाँ सबसे पहले ध्यान खींचती हैं।
• इसकी गरमाहट भरी ऊर्जा को कठिन दिनों में अच्छा पक्ष देख पाने से जोड़ा जाता है।
• लोक विश्वास में बच्चों की जेब में रखा गया हकीक उन्हें चिड़चिड़ेपन और झगड़े से दूर रखता है।
• परंपरागत रूप से इसे ख़ुशी और भीतरी ठहराव का पत्थर कहा गया है।
हकीक ज़मीन से जुड़ी सफलता और धैर्य का प्रतीक है। व्यापार करने वालों में इसे कमर से नीचे, जैसे जेब में रखने का चलन रहा है, और अंगूठी के रूप में इसे आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है। यह उन लोगों को भाता है जो रोज़मर्रा में ठहराव, सुरक्षा का एहसास और शांत मन चाहते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 6.5 - 7
रासायनिक संरचना: SiO₂
विशिष्ट गुरुत्व: 2.60 - 2.64
चक्र: मूलाधार, स्वाधिष्ठान, अनाहत
देखभाल: गुनगुने पानी और मुलायम ब्रश से साफ करें, फिर अच्छी तरह सुखाएँ। धूप से इसे नुकसान नहीं होता।
एक्वामरीन बेरिल परिवार का पारदर्शी रत्न है और इसका नाम लातीनी शब्दों से बना है जिनका अर्थ है समुद्र का पानी। इसका रंग गहरे सागरी नीले से लेकर हल्के आसमानी नीले तक जाता है, जिसमें अक्सर हरे रंग की झलक रहती है। यह रंग क्रिस्टल के भीतर मौजूद लोहे की सूक्ष्म मात्रा से आता है। पन्ना भी इसी खनिज परिवार का है, फ़र्क़ सिर्फ़ रंग का है।
यह पत्थर बड़े और साफ़ क्रिस्टलों के रूप में निकलता है, इसलिए बड़े नग तराशना आसान रहता है। ब्राज़ील, पाकिस्तान, नाइजीरिया, रूस और भारत इसके जाने-पहचाने स्रोत हैं। तराशे हुए एक्वामरीन को अंगूठी, लॉकेट और कान की बाली में जड़ा जाता है, जबकि बिना तराशे क्रिस्टल घर और दफ़्तर में सजावट के लिए रखे जाते हैं। यह क़ीमती पत्थर है, इसलिए बाज़ार में इसकी नकल भी ख़ूब मिलती है और ख़रीदते समय सफ़ाई, पारदर्शिता और रंग की गहराई देखी जाती है।
पत्थरों की परंपरा में एक्वामरीन को ठहराव और साफ़ दिमाग़ का रत्न कहा जाता है। नाविक इसे यात्रा में साथ रखते थे, इस विश्वास के साथ कि यह समुद्र को शांत रखेगा। इसे गले के पास हार में या हाथ की अंगूठी में पहनने का चलन रहा है, और घबराहट के क्षणों में इसे मुट्ठी में थामने की सलाह पुराने स्रोत देते हैं।
एक्वामरीन पत्थर की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे साँस की तकलीफ़, गले की खराश और थायरॉइड से जुड़ी शिकायतों के समय पास रखा जाता था।
• लोक विश्वास में इसे पाचन की सामान्य लय बनाए रखने से जोड़ा गया है।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह शरीर में सूजन और जमाव के एहसास को हल्का करता है।
• परंपरा में इसे दाँतों और जबड़े की हड्डी का ख़याल रखने वालों के लिए उपयुक्त बताया गया है।
• माना जाता है कि यह अपनी बात कहने की हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
• इसे तनाव के लिए सबसे अच्छे पत्थरों में गिना जाता है, क्योंकि इसका नीला रंग मन को ठंडक देता है।
• पुरानी मान्यता है कि यह शरीर और मन के बीच का तालमेल मज़बूत करता है और अंतर्ज्ञान को तेज़ करता है।
• लोक परंपरा इसे झिझक, निराशा और उलझी हुई भावनाओं को तोड़ने वाला पत्थर बताती है।
• माना जाता है कि यह किए जा रहे काम में अर्थ और भीतरी संतोष का एहसास जगाता है।
• पुराने स्रोतों में इसे नाविकों और यात्रियों का रक्षक पत्थर कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे बहस के बीच ठंडे दिमाग़ से जवाब देने में सहायक माना जाता है।
• परंपरा में इसे शिक्षकों, वकीलों और मंच पर बोलने वालों के लिए उपयुक्त बताया गया है।
• माना जाता है कि यह पुरानी नाराज़गी को छोड़ देने और आगे बढ़ने में मदद करता है।
• पुरानी मान्यता है कि इसे तकिये के पास रखने से बेचैन रातें हल्की लगती हैं।
एक्वामरीन साहस, साफ़ अभिव्यक्ति और भीतरी शांति का प्रतीक है। यह उन लोगों को पसंद आता है जिन्हें अक्सर बोलना पड़ता है, जो जल्दी घबरा जाते हैं या जो अपनी भावनाओं को शब्द देना सीखना चाहते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 7.5 - 8
रासायनिक संरचना: Be₃Al₂Si₆O₁₈
विशिष्ट गुरुत्व: 2.68 - 2.74
चक्र: विशुद्ध, अनाहत
देखभाल: गुनगुने पानी और मुलायम ब्रश से साफ करें। लंबे समय तक सीधी धूप में न रखें, रंग फीका पड़ जाता है।
लापीस लाजुली, जिसे हिंदी में लाजवर्त कहा जाता है, गहरे नीले रंग की एक चट्टान है जिसमें लेज़्यूराइट का नीलापन, सफ़ेद कैल्साइट की लकीरें और सुनहरे पाइराइट के बिंदु एक साथ मिलते हैं। यही सुनहरे बिंदु इसे रात के तारों भरे आसमान जैसा रूप देते हैं और असली नमूने की पहचान का सहारा बनते हैं।
अफ़ग़ानिस्तान के बदख़्शाँ इलाक़े की खदानें हज़ारों साल से इसका सबसे बड़ा स्रोत रही हैं, और वहीं से यह मिस्र, मेसोपोटामिया और आगे यूरोप तक पहुँचा। प्राचीन मिस्र में इसे राजसी पत्थर माना गया और तूतनख़ामुन के मुखौटे में यह जड़ा हुआ है। पुनर्जागरण काल में इसे पीसकर अल्ट्रामरीन नाम का बेशक़ीमती नीला रंग बनाया जाता था, जो सोने से भी महँगा बिकता था।
यह पत्थर अपेक्षाकृत नरम और छिद्रयुक्त है, और इसके भीतर के पाइराइट कण पानी से जंग पकड़ सकते हैं, इसलिए इसे भिगोना नहीं चाहिए। पत्थरों की परंपरा में इसे सच बोलने और भीतर की समझ का रत्न कहा जाता है, और इसे गले के पास पहनने का चलन है।
लापीस लाजुली की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे सच कहने की हिम्मत देने वाला पत्थर कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे सिर के भारीपन और थकी हुई आँखों से जोड़ा जाता रहा है।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह गहरी और व्यवस्थित सोच में सहारा देता है।
• माना जाता है कि यह दबी हुई भावनाओं को शब्द देने में मदद करता है।
• परंपरा में इसे विद्वानों, लेखकों और शिक्षकों का पत्थर बताया गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह गले और आवाज़ की देखभाल से जुड़ा है।
• लोक परंपरा इसे रात में बेचैन मन को शांत करने वाला मानती है।
• माना जाता है कि यह पुराने भावनात्मक बोझ को पहचानने में सहायक है।
• पुराने स्रोतों में इसे नेतृत्व और न्यायप्रियता का प्रतीक कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे नज़र और दुर्भावना से बचाव के लिए पहना जाता रहा है।
• माना जाता है कि यह दोस्ती में ईमानदारी और भरोसा बढ़ाता है।
• परंपरा में इसे अंतर्ज्ञान और सपनों की समझ से जोड़ा गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह अत्यधिक गुस्से को व्यावहारिक शब्दों में बदल देता है।
• लोक परंपरा इसे आत्म-चिंतन के लंबे दौर में साथी पत्थर बताती है।
लापीस लाजुली सत्य, ज्ञान और भीतरी गरिमा का प्रतीक है। यह उन लोगों को उपयुक्त माना जाता है जो अपनी बात साफ़ रखना चाहते हैं, जो अध्ययन और लेखन से जुड़े हैं या जो गहरे नीले रंग की शाही उपस्थिति पसंद करते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 5 - 6
रासायनिक संरचना: (Na,Ca)₈(AlSiO₄)₆(SO₄,S,Cl)₂
विशिष्ट गुरुत्व: 2.50 - 3.00
चक्र: विशुद्ध, आज्ञा
देखभाल: पानी में न भिगोएँ, यह पत्थर छिद्रयुक्त होता है। मुलायम सूखे कपड़े से पोंछें और सीधी धूप से दूर रखें।
मूँगा खनिज नहीं, बल्कि समुद्र में रहने वाले नन्हे जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट कंकाल से बना जैविक पदार्थ है। ये जीव सैकड़ों वर्षों में शाखाओं जैसी संरचनाएँ बनाते हैं, जिन्हें काटकर और पॉलिश करके गहनों में जड़ा जाता है। इसका रंग हल्के गुलाबी और सैल्मन से लेकर गहरे सिंदूरी लाल तक जाता है, और सफ़ेद तथा काली किस्में भी होती हैं।
भूमध्यसागर, जापान का समुद्र और ताइवान के आसपास के जल इसके पारंपरिक स्रोत रहे हैं। भारत में मूँगा नवरत्नों में गिना जाता है और सदियों से अंगूठी में जड़वाकर पहना जाता रहा है। इटली में इसे बुरी नज़र से बचाने वाला ताबीज़ माना गया और वहाँ की परंपरा में नवजात शिशुओं को मूँगे की छोटी शाखा भेंट करने का रिवाज़ था।
यह बहुत नरम है और अम्ल तथा पानी इसकी चमक ख़राब कर देते हैं, इसलिए इत्र, साबुन और पसीने से इसे बचाना ज़रूरी है। पत्थरों की परंपरा में इसे जीवनशक्ति और रक्षा का पत्थर कहा जाता है।
मूँगे की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे बुरी नज़र से बचाने वाला ताबीज़ माना जाता रहा है।
• लोक विश्वास में इसे बच्चों की रक्षा से जोड़ा गया है।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह रक्त संचार और शरीर की गरमाहट से जुड़ा है।
• माना जाता है कि यह हड्डियों की देखभाल की परंपराओं में सहायक समझा जाता था।
• परंपरा में इसे साहस और पहल करने की ताक़त से जोड़ा जाता रहा है।
• पुरानी मान्यता है कि यह डर के क्षणों में मन को थाम लेता है।
• लोक परंपरा इसे समुद्री यात्रा में सुरक्षा का प्रतीक बताती रही है।
• माना जाता है कि यह क्रोध को नियंत्रित करके व्यावहारिक ऊर्जा में बदलता है।
• पुराने स्रोतों में इसे परिवार में एकजुटता का पत्थर कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे भावनात्मक ठंडेपन को गरमाने वाला माना जाता है।
• माना जाता है कि यह किसी नई ज़िम्मेदारी को उठाने का हौसला देता है।
• परंपरा में इसे थकान के दौर में ताक़त लौटाने से जोड़ा गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह घर में समृद्धि का प्रतीक बनकर रखा जाता था।
• लोक परंपरा इसे संकोची स्वभाव वालों के लिए उपयुक्त बताती है।
मूँगा जीवन, रक्षा और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक है। यह उन लोगों को भाता है जो परंपरागत रत्नों की ओर झुकाव रखते हैं, जो अपने आसपास सुरक्षा का एहसास चाहते हैं या जो समुद्र से जुड़ी चीज़ों की ओर आकर्षित होते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 3 - 4
रासायनिक संरचना: CaCO₃
विशिष्ट गुरुत्व: 2.60 - 2.70
चक्र: मूलाधार, स्वाधिष्ठान
देखभाल: पानी में न भिगोएँ, यह पत्थर छिद्रयुक्त होता है। मुलायम सूखे कपड़े से पोंछें और सीधी धूप से दूर रखें।
रोज़ क्वार्ट्ज़ या गुलाबी स्फटिक क्वार्ट्ज़ का वह रूप है जिसका रंग बहुत हल्के गुलाबी से लेकर गाढ़े पीच-गुलाबी तक जाता है। यह रंग क्रिस्टल में मौजूद टाइटेनियम, लोहे और मैंगनीज़ की सूक्ष्म मात्रा से आता है। ज़्यादातर नमूने दूधिया और पारभासी होते हैं, पूरी तरह साफ़ रोज़ क्वार्ट्ज़ बहुत कम मिलता है।
ब्राज़ील, मेडागास्कर, दक्षिण अफ़्रीका और भारत इसके मुख्य स्रोत हैं। यह बड़े टुकड़ों में निकलता है, इसलिए इससे दिल के आकार की आकृतियाँ, गोले, मालाएँ और मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। मेसोपोटामिया की खुदाई में इससे बने गहने मिले हैं, यानी यह हज़ारों साल से इस्तेमाल में है।
पत्थरों की परंपरा में इसे प्रेम का पत्थर कहा जाता है, पर यह सिर्फ़ जोड़े के प्रेम तक सीमित नहीं। परंपरा में इसे ख़ुद के लिए नरमी सीखने से भी जोड़ा गया है। इसे हृदय के पास लॉकेट में पहनने या सोने के कमरे में रखने का चलन है। ध्यान रहे कि लंबी धूप इसका गुलाबी रंग फीका कर देती है।
रोज़ क्वार्ट्ज़ की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे प्रेम और कोमलता का पत्थर कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे ख़ुद के प्रति सख़्ती कम करने से जोड़ा जाता है।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह पुरानी नाराज़गी को धीरे-धीरे नरम करता है।
• माना जाता है कि यह हृदय और रक्त संचार की देखभाल से जुड़ा है।
• परंपरा में इसे त्वचा की कोमलता की परंपराओं में इस्तेमाल किया जाता रहा है।
• पुरानी मान्यता है कि यह नींद से पहले मन को शांत करता है।
• लोक परंपरा इसे दोस्ती और मेल-मिलाप बढ़ाने वाला बताती है।
• माना जाता है कि यह अकेलेपन के एहसास को हल्का करता है।
• पुराने स्रोतों में इसे माँ और बच्चे के बीच जुड़ाव का पत्थर कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे किसी बिछड़ने के बाद सांत्वना से जोड़ा जाता है।
• माना जाता है कि यह माफ़ करने का रास्ता आसान करता है।
• परंपरा में इसे संकोच तोड़कर भावनाएँ कहने में सहायक बताया गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह ईर्ष्या और अधिकार-भाव को कम करता है।
• लोक परंपरा इसे कठोर स्वभाव वालों के लिए संतुलन का पत्थर मानती है।
• माना जाता है कि यह घर में शांत और स्नेहपूर्ण माहौल बनाए रखता है।
रोज़ क्वार्ट्ज़ प्रेम, क्षमा और भीतरी नरमी का प्रतीक है। यह उन लोगों को उपयुक्त माना जाता है जो रिश्तों में गरमाहट चाहते हैं, जो ख़ुद के साथ सख़्त रहते आए हैं या जो कोमल गुलाबी रंग की शांत उपस्थिति पसंद करते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 7
रासायनिक संरचना: SiO₂
विशिष्ट गुरुत्व: 2.65
चक्र: अनाहत
देखभाल: गुनगुने पानी और मुलायम ब्रश से साफ करें। लंबे समय तक सीधी धूप में न रखें, रंग फीका पड़ जाता है।
फ़िरोज़ा अपारदर्शी पत्थर है जिसका रंग आसमानी नीले से लेकर हरे-नीले तक जाता है। कई नमूनों में भूरे, काले या सुनहरे रंग की बारीक नसें फैली रहती हैं, जिन्हें मैट्रिक्स कहा जाता है, और इसी वजह से हर टुकड़ा अलग दिखता है। यह तांबे से भरपूर एक जलयुक्त फ़ॉस्फ़ेट खनिज है, और तांबे की मौजूदगी ही इसे उसका ख़ास नीलापन देती है।
इसका नाम फ़्रांसीसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ था तुर्की पत्थर, क्योंकि ईरान से निकला माल तुर्की के रास्ते यूरोप पहुँचता था। प्राचीन मिस्र, फ़ारस, तिब्बत और उत्तरी अमेरिका की मूल जनजातियों ने इसे बहुत महत्व दिया, और चाँदी में जड़ा फ़िरोज़ा आज भी उसी परंपरा की पहचान है। असली फ़िरोज़ा दुर्लभ और महँगा है, इसलिए बाज़ार में रंगे हुए और नक़ली पत्थर बहुत मिलते हैं।
यह नरम और छिद्रयुक्त पत्थर है, यानी यह नमी सोख लेता है। पानी में भिगोने पर इसका रंग बदल सकता है और सतह पर दरार आ सकती है, इसलिए इसे कभी पानी में नहीं डालना चाहिए। इत्र, साबुन और तेज़ धूप भी इसे नुक़सान पहुँचाते हैं, और इसी नाज़ुकपन के कारण इसे अलग से, नरम कपड़े में लपेटकर रखने की सलाह दी जाती है।
फ़िरोज़ा पत्थर की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे बुरी नज़र से बचाने वाला ताबीज़ कहा गया है।
• लोक विश्वास में इसे बेचैनी और घबराहट के दौर में पास रखा जाता था।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह शोक के समय सांत्वना देने वाला पत्थर है।
• माना जाता है कि यह किसी अचानक झटके के बाद संभलने में सहारा देता है।
• परंपरा में इसे यात्रियों का रक्षक कहा गया, ख़ासकर लंबे सफ़र पर।
• पुरानी मान्यता है कि यह पाचन की शिकायत के समय कमर की पेटी में पहना जाता था।
• लोक परंपरा इसे रक्तचाप की सामान्य लय से जोड़कर देखती रही है।
• माना जाता है कि यह अपनी ज़रूरतें खुलकर कहने में मदद करता है।
• पुराने स्रोतों में इसे बुद्धिमानी और ठहरी हुई सोच का पत्थर बताया गया है।
• लोक विश्वास में इसे दो लोगों के बीच सुलह कराने वाला माना जाता है।
• माना जाता है कि यह अत्यधिक थकान के दौर में ऊर्जा लौटाता है।
• परंपरा में इसे चाँदी में जड़वाकर पहनने की सलाह दी जाती रही है।
• पुरानी मान्यता है कि यह घर में शांति का माहौल बनाए रखता है।
• लोक परंपरा इसे साँस की तकलीफ़ की देखभाल से जोड़ती रही है।
फ़िरोज़ा शांति, संतुलन और सुरक्षा का प्रतीक है। यह उन लोगों को भाता है जो भीतर ठहराव चाहते हैं, जो किसी कठिन दौर से उबर रहे हैं या जो नाज़ुक पर बेहद ख़ूबसूरत पत्थरों की देखभाल करना जानते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 5 - 6
रासायनिक संरचना: CuAl₆(PO₄)₄(OH)₈·5H₂O
विशिष्ट गुरुत्व: 2.31 - 2.84
चक्र: विशुद्ध, अनाहत, आज्ञा
देखभाल: पानी में न भिगोएँ, यह पत्थर छिद्रयुक्त होता है। मुलायम सूखे कपड़े से पोंछें और सीधी धूप से दूर रखें।
जेड नाम दो अलग खनिजों के लिए इस्तेमाल होता है: जेडाइट और नेफ़्राइट। दोनों दिखने में मिलते-जुलते हैं, पर जेडाइट ज़्यादा दुर्लभ और चमकदार होता है, जबकि नेफ़्राइट अपनी असाधारण मज़बूती के लिए जाना जाता है। सबसे प्रसिद्ध रंग हरा है, पर यह सफ़ेद, पीला, लैवेंडर, भूरा और काला भी होता है।
चीन में जेड को पाँच हज़ार साल से स्वर्ग का पत्थर माना जाता रहा है और वहाँ इसे सोने से भी ऊँचा दर्जा दिया गया। म्यांमार जेडाइट का सबसे बड़ा स्रोत है, जबकि नेफ़्राइट न्यूज़ीलैंड, कनाडा, रूस और चीन से मिलता है। न्यूज़ीलैंड की माओरी परंपरा में इससे बने पेंडेंट पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपे जाते हैं।
इसकी रेशेदार भीतरी संरचना इसे इतना सख़्त बनाती है कि प्राचीन काल में इससे औज़ार और हथियार तक बनाए जाते थे। पत्थरों की परंपरा में इसे संतुलन और सौभाग्य का रत्न कहा जाता है और इसे कंगन के रूप में पहनना सबसे प्रचलित तरीक़ा है।
जेड की विशेषताएँ
• पारंपरिक रूप से इसे सौभाग्य और लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता रहा है।
• लोक विश्वास में इसे अत्यधिक भावनाओं को समतल करने वाला बताया गया है।
• पुराने स्रोतों के अनुसार यह हथेली में गरम होकर आराम का एहसास देता है।
• माना जाता है कि यह गुर्दों और शरीर के जल संतुलन की परंपराओं से जुड़ा है।
• परंपरा में इसे शिक्षकों और वक्ताओं के लिए उपयुक्त बताया गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह डर के क्षणों में आत्मविश्वास लौटाता है।
• लोक परंपरा इसे न्यायप्रिय सोच और निष्पक्षता से जोड़ती रही है।
• माना जाता है कि यह सफलता के बाद अहंकार को क़ाबू में रखता है।
• पुराने स्रोतों में इसे दाँतों और हड्डियों की देखभाल से जोड़ा गया है।
• लोक विश्वास में इसे यात्रा में सुरक्षा का ताबीज़ माना जाता है।
• माना जाता है कि यह सपनों को शांत और सुखद बनाता है।
• परंपरा में इसे परिवार में सामंजस्य बनाए रखने वाला पत्थर कहा गया है।
• पुरानी मान्यता है कि यह मेहनत का उचित फल मिलने तक धैर्य देता है।
• लोक परंपरा इसे रोज़ पहनने लायक़ संतुलन का पत्थर मानती है।
जेड संतुलन, बुद्धिमानी और शांत सौभाग्य का प्रतीक है। यह उन लोगों को भाता है जो रोज़मर्रा में ठहराव चाहते हैं, जो निष्पक्ष निर्णय लेने की ज़िम्मेदारी उठाते हैं या जो हरे रंग की गहरी, शांत आभा पसंद करते हैं। यहाँ बताए गए उपयोग परंपरा और लोक विश्वास का हिस्सा हैं, ये डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं हैं।
कठोरता स्तर: 6 - 7
रासायनिक संरचना: NaAlSi₂O₆ / Ca₂(Mg,Fe)₅Si₈O₂₂(OH)₂
विशिष्ट गुरुत्व: 2.90 - 3.38
चक्र: अनाहत
देखभाल: गुनगुने पानी और मुलायम ब्रश से साफ करें, फिर अच्छी तरह सुखाएँ। धूप से इसे नुकसान नहीं होता।