जो बात सबसे पहले याद आती है वह शार्क नहीं, नीचे का पानी होता है, और पुराने पाठ भी जानवर से नहीं, उसी पानी से शुरू होते हैं।
किसी से उसका शार्क वाला सपना पूछो तो पहला ब्योरा लगभग कभी शार्क का नहीं होता। पहले पानी आता है: कितना गहरा था, किनारा कितनी दूर दिख रहा था, पैर नीचे ज़मीन छू पा रहे थे या नहीं। व्याख्या करने वाले इस क्रम को हलके में नहीं लेते, और आम पाठ जानवर को ऐसे दबाव की तरह लेता है जिसका पूरा आकार दिखता नहीं, और जो ऐसी जगह मिला है जहाँ से लौटना धीमा पड़ेगा।
खुले समुंदर को आमतौर पर ऐसी हालत माना जाता है जिसका कोई आसान किनारा नहीं, जिससे बस एक क़दम में बाहर नहीं निकला जा सकता। उथले पानी में वही जानवर बिलकुल दूसरी बात कहता है: ख़तरा वहाँ आ पहुँचा जहाँ उसका समाना ही नहीं चाहिए था। यही वजह है कि तैरने के हौज़ या पानी भरी गली में शार्क देखने वाले लोग खुले समुंदर वाले रूप से कहीं ज़्यादा बेचैन होकर जागते हैं।
सबसे ज़्यादा सुनाया जाने वाला रूप वही है जिसमें शार्क चक्कर काटती रहती है और छूती नहीं, और उसका सीधा पाठ नुक़सान नहीं बल्कि इंतज़ार है: कुछ मौजूद है, हुआ कुछ नहीं, और यह इंतज़ार ही पूरा अनुभव है। रेत पर खड़े होकर दूसरों को तैरते देखने वाला रूप किसी और के लिए पाली गई फ़िक्र माना जाता है। सचमुच हमला होने वाले सपने उतने नहीं आते जितनी इस सपने की बदनामी है।
एक बात साफ़ कह देनी चाहिए। इस तस्वीर से चिपका बहुत सारा डर एक फ़िल्म और उसके पचास साल के नक़लों ने भरा है, और सपने पर्दे से खुलकर उधार लेते हैं। जो नियमित गोता लगाता है और शार्क को पास से गुज़रते देख चुका है, वह नींद में अलग यादें लेकर जाता है, बनिस्बत उसके जिसके पास सिर्फ़ दो सुरों वाली धुन की याद है।
इस पाठ में कहीं भी आगे की घटना का हिसाब नहीं है, और न ही यह किसी के इरादे बताता है। तस्वीर बस इतना पूछती है कि इस वक़्त क्या चीज़ बड़ी और धुँधली लग रही है, और कहीं तुम्हारा टिकना एक ही जगह इरादे से ज़्यादा लंबा तो नहीं हो गया।


