ऊपर उठने और नीचे गिरने का सपना, जिसकी मशीन किसी और ने बनाई है, और जिसमें दरवाज़ा ख़ुद तय करता है कि कब खुलेगा।
किसी भी प्रतीक से पहले एक सादी बात: लिफ़्ट के सपने उन लोगों में सबसे ज़्यादा हैं जो रोज़ लिफ़्ट में चढ़ते-उतरते हैं। इसके बाद बात यह है कि इस दृश्य को आमतौर पर ऐसी आवाजाही माना जाता है जिसकी बागडोर तुम्हारे हाथ में नहीं: बटन तक ही तुम्हारा हाथ जाता है, बाक़ी काम किसी और की बनाई मशीन करती है। इसके सारे रूप एक ही सवाल के अलग-अलग नाप हैं, कि क़ाबू कितना है और मशीन कैसा बर्ताव कर रही है।
यह रूप सबसे ज़्यादा सुनाया जाता है और इसके पाठ भी एक-दूसरे से मिलते हैं। दो मंज़िलों के बीच रुकी लिफ़्ट को ऐसे दौर की तरह पढ़ा जाता है जहाँ न तुम पहले वाली जगह पर हो, न वहाँ जहाँ पहुँचना है, और जहाँ इंतज़ार के अलावा कोई काम बचा नहीं। लोग अक्सर बत्ती का, दरवाज़े के ऊपर टिमटिमाते अंकों का, या जवाब न देते बटनों का ज़िक्र करते हैं। इन्हीं ब्योरों को जागती ज़िंदगी की उस चीज़ के साथ मिलाया जाता है जो इस वक़्त हिल नहीं रही।
नीचे गिरती लिफ़्ट गिरने वाले सपनों के बड़े परिवार के साथ रखी जाती है और अक्सर उन्हीं हालात में आती है, ख़ासकर टूटी हुई या कम नींद के बाद। बहुत तेज़ी से ऊपर चले जाने का अपना छोटा पाठ है, कि तरक़्क़ी तैयारी से आगे निकल गई। जो दरवाज़े बंद नहीं होते, या ग़लत मंज़िल पर खुल जाते हैं, उन्हें खुल जाने का दृश्य माना जाता है: तुम्हें वहाँ देख लिया गया जहाँ दिखने की कोई योजना नहीं थी।
इस पन्ने का ज़्यादातर काम यही फ़र्क़ करता है। सीढ़ी वह मेहनत है जो तुम्हें ख़ुद लगानी पड़ती है, एक-एक क़दम, और पाठ भी उसे उसी तरह लेते हैं। लिफ़्ट मेहनत और चुनाव, दोनों एक साथ हटा देती है, इसलिए एक ही इंसान को सीढ़ी थकाती है और लिफ़्ट बेचैन करती है। जो कभी सचमुच लिफ़्ट में फँसा हो, या जो उसमें चढ़ने से कतराता हो, उसका सपना उसी असली याद के भीतर चल रहा है, और वह याद यहाँ लिखी हर बात से भारी पड़ती है।


