परंपरा इसे बदलाव की दहलीज़ मानती है, पर लोग उड़ान नहीं बताते: क़तार, वह गेट जो जगह बदलता रहता है, और बिना उन्हें लिए जाता जहाज़।
हवाई अड्डा वह जगह है जहाँ किसी को टिकना नहीं होता, और नींद में ठीक यही बात उसे इतना काम का बना देती है। पुराने पाठ इसे बदलाव की दहलीज़ मानते हैं, यानी एक इंतज़ाम और अगले इंतज़ाम के बीच पड़ी ख़ाली जगह। फिर भी लोग जो बताते हैं वह उड़ान है ही नहीं। वह क़तार है, वह गेट है जो एक जगह टिकता नहीं, और वह जहाज़ है जिसमें चढ़ना कभी हो ही नहीं पाता।
अर्थ और अनुभव के बीच की यही दूरी काम की चीज़ है। पढ़ने वाले टर्मिनल को दहलीज़ मानते हैं, इसलिए जो सपना तुम्हें वहीं रोके रखे और निकलने न दे, उसे आमतौर पर बीच में अटके होने की तस्वीर की तरह लिया जाता है: इस्तीफ़ा दे दिया पर हिसाब बाक़ी है, नई जगह हाँ कह दी पर काम शुरू नहीं हुआ, फ़ैसला हो गया पर उसका असर दिखना बाक़ी है। सपने की झुँझलाहट उड़ने के डर से नहीं, इंतज़ार की झुँझलाहट से मेल खाती है।
पासपोर्ट या बोर्डिंग पास खो जाना उस फ़िक्र से जुड़ा है कि नई हालत जो काग़ज़ माँगेगी वे तुम्हारे पास हैं या नहीं। ऐसे टर्मिनल में भटकना जो बार-बार अपनी शक्ल बदल रहा हो, रास्ता भूलने वाले सपनों के परिवार का हिस्सा है। जहाज़ को अपने बिना जाते देखने का अपना पुराना पाठ मौक़े से जुड़ा है, हालाँकि सावधान पढ़ने वाले इसे एक एहसास का बयान मानते हैं, तुम्हारे आगे के दिनों की रिपोर्ट नहीं। कहीं पहुँचकर सीधे शहर में निकल जाना सबसे कम बताया जाने वाला और सबसे शांत रूप है, और यह अक्सर तब आता है जब कोई बात सचमुच तय हो चुकी हो।
सबसे सीधी वजह असली सफ़र है। लोग यात्रा से पहले वाले दो हफ़्तों में और लौटने के बाद वाले हफ़्ते में हवाई अड्डों के सपने बताते हैं, और जो हर महीने उड़ता है वह इन्हें वैसे ही देखता है जैसे रोज़ बस पकड़ने वाला बस अड्डे को, यानी बिना किसी प्रतीक के। जिसने कभी तीन प्लास्टिक कुर्सियों पर रात काटी है, उसके पास इस जगह की ऐसी यादें हैं जिनसे कोई आम पाठ नहीं जीत सकता, और ऐसे में अपनी याद ही बेहतर रहनुमा है।


