बाघ का सपना सुनाने वाला लगभग हर इंसान पहले यह बताता है कि जानवर कितनी दूर था। परंपरा का पूरा वज़न उसी फ़ासले पर टिका है, जानवर पर नहीं।
बाघ का सपना सुनाने वाले लगभग सब पहले यह बताते हैं कि जानवर कितनी दूर था। डर बाद में आता है, नाप पहले। पुराने व्याख्याकारों की दिलचस्पी भी ठीक इसी नाप में थी, क्योंकि इस जानवर को बहुत पहले से ऐसी ताक़त माना गया जिसे अपने होने का सबूत देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पाठ इस पर मुड़ता है कि वह ताक़त तुम्हारी तरफ़ बढ़ रही थी, तुम्हें अनदेखा कर रही थी, या जा चुकी थी।
मैदान के दूसरे सिरे से देखता बाघ और तीन क़दम दूर खड़ा बाघ दो अलग तस्वीरें मानी जाती हैं। दूर वाली शक्ल ऐसी ताक़त की ख़बर समझी जाती है जो सच्ची है पर अभी सिर पर नहीं, चाहे वह कोई इंसान हो, कोई संस्था हो या ख़ुद तुम्हारे मिज़ाज का कोई हिस्सा। पास आ जाना उसी ताक़त का पहुँच जाना कहा गया है। और वह शक्ल जिसमें जानवर पीछे-पीछे चलता रहे पर फ़ासला कभी न मिटे, पीछा किए जाने वाले सपनों के परिवार में बैठती है, और वे ज़्यादातर उन हफ़्तों के बाद आते हैं जिनमें कोई फ़ैसला टाला गया हो, किसी सचमुच के ख़तरे के बाद नहीं।
पढ़ने वालों में गिने-चुने ही चिड़ियाघर के बाहर बाघ से मिले होंगे, इसलिए रात में जो जानवर आता है वह ज़्यादातर डॉक्यूमेंट्री, फ़िल्मों और एशिया के बड़े हिस्से में उसके राष्ट्रीय निशान होने से मिलकर बनता है। यह उसे ख़ारिज करने की वजह नहीं। यह पूछने की वजह है कि तुम्हारा बाघ कौन सा था। जिसने बीस साल बड़ी बिल्लियों के बीच काम किया है और जिसने ख़बरों में हमले की तस्वीर देखी है, वे एक जैसा सपना नहीं देख रहे, और कोई कोश तब तक इन दोनों में फ़र्क़ नहीं कर सकता जब तक यह न जान ले कि तुम कौन हो। सोने से पहले यह जानवर तुम्हारे लिए जो था, वह ऊपर लिखी हर पंक्ति से भारी है।


