सर्पधारी यानी ओफ़िउकस की ख़बर कुछ सालों के अंतर पर लौटती रहती है, और उसके बाद भी तुम्हारी राशि वही रहती है, क्योंकि राशिचक्र बारह बराबर हिस्सों का है।
नहीं, राशिचक्र में तेरहवीं राशि नहीं है, और इसकी वजह किसी नई खोज में नहीं, परिभाषा में है। ओफ़िउकस यानी सर्पधारी सचमुच का तारामंडल है, और सूरज हर साल कुछ दिन उसी के आगे से गुज़रता भी है। फिर भी वह राशि नहीं है, क्योंकि राशियाँ तारामंडल हैं ही नहीं, और दो हज़ार साल से भी ज़्यादा हो गया जब से दोनों की राहें अलग हैं।
कहानी की जड़ आमतौर पर तारामंडलों पर लिखा कोई पढ़ाई वाला पन्ना होता है, जिसे बाद में ऐसे छापा जाता है मानो किसी अंतरिक्ष एजेंसी ने राशिफल के कॉलम जाँचकर फ़ैसला सुना दिया हो। एजेंसियाँ ज्योतिष नहीं करतीं, और वे पन्ने ख़ुद यह बात साफ़ लिखते हैं।
फिर सुर्ख़ी के साथ तारीख़ों की नई तालिका चलने लगती है और लाखों लोग रातोंरात दूसरी राशि के बना दिए जाते हैं। असल में उस दिन कुछ भी दोबारा नहीं गिना गया, न किसी ज्योतिषी संस्था ने कोई सुधार जारी किया।
ओफ़िउकस का मतलब है साँप थामे आदमी, इसीलिए हिंदी में इसे सर्पधारी कहते हैं। यह सबसे पुराने दर्ज तारा-आकारों में से एक है, और यूनानी लिखने वालों ने इसे उस वैद्य असक्लेपियस से जोड़ा जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने मुर्दों को जिलाना सीख लिया। यह वृश्चिक और धनु के तारा-समूहों के बीच पड़ता है, और सूरज साल भर आसमान में जिस लकीर पर चलता दिखता है, उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं, वही लकीर इसके निचले किनारे को छू जाती है।
यह चर्चा में आया एक दफ़्तरी काम की वजह से। 1930 में खगोलविदों की अंतरराष्ट्रीय संस्था ने सभी 88 तारामंडलों के चारों तरफ़ तय सीमाएँ खींच दीं और तारों के बिखरे झुंड आसमान के नपे-तुले इलाक़ों में बदल गए, ठीक वैसे जैसे नक्शा खुली ज़मीन को देशों में बाँट देता है। लकीरें काग़ज़ पर आ जाने के बाद कोई भी गिन सकता था कि सूरज की सालाना राह कितने इलाक़ों से गुज़रती है, और गिनती तेरह निकली। ओफ़िउकस वही तेरहवाँ है।
सूरज हर साल करीब ढाई हफ़्ते उसके आगे रहता है, नवंबर के आख़िर से दिसंबर के बीच तक। आसमान के बारे में यह बात ठीक है और राशिफल के लिए बेकार, दोनों एक साथ सच हैं।
पश्चिमी ज्योतिष एक गोले पर काम करता है जिसे बारह बराबर हिस्सों में काटा गया है, हर हिस्सा 30 डिग्री का। यह गोला मार्च वाले विषुव पर टँगा है, यानी साल के उस पल पर जब सूरज उत्तर की ओर बढ़ता हुआ भूमध्य रेखा की सीध पार करता है और दिन और रात एक जैसे लंबे हो जाते हैं। मेष की पहली डिग्री उसी बिंदु से तय होती है। बाक़ी ग्यारह बराबर क़दमों पर आते हैं और बारह मिलकर गोला पूरा भर देते हैं, पीछे कुछ बचता नहीं।
इसे सायन राशिचक्र कहते हैं, यानी वह जो साल के मोड़ों से बना है, तारों से नहीं। इससे पूछो कि मेष कहाँ से शुरू होता है तो जवाब में विषुव से नापा गया कोण मिलेगा, तारों का नक्शा इसमें खुलता ही नहीं, इसलिए वह इसे सुधार भी नहीं सकता। गोले के बारह बराबर हिस्से गणित की बात है, और क्रांतिवृत्त पर एक और तारामंडल निकल आने से वह उतना ही बदलती है जितना नया पहाड़ मिल जाने से दिशासूचक की डिग्रियाँ बदलती हैं।
इस बहस के नीचे एक सच्चा खगोलीय खिसकाव मौजूद है। धरती बिलकुल सधी हुई धुरी पर नहीं घूमती, वह धीमे पड़ते लट्टू की तरह डोलती है, और इस डोलन का एक पूरा चक्कर करीब 26,000 साल लेता है। धुरी के झूलने से विषुव का बिंदु तारों की पृष्ठभूमि पर पीछे सरकता जाता है, करीब 72 साल में एक डिग्री, और राशियों के नाम मौसमी ढाँचे से बँधने के बाद से यह जमा होकर लगभग एक पूरी राशि जितना हो चुका है।
इसलिए बार-बार लौटने वाली सुर्ख़ी में सच का एक दाना ज़रूर है। सायन हिसाब जब कहता है कि सूरज मेष में है, उस वक़्त सूरज मीन के तारों के आगे खड़ा होता है। पर यह नई जानकारी नहीं है: हिपार्कस ने ईसा से दो सदी पहले इस डोलन का ब्योरा लिख दिया था, और सायन व्यवस्था बनाने वाले यह पहले से जानते थे।
तारों के पीछे चलने वाली ज्योतिष भी मौजूद है, और भारत की परंपरा वही है। वह निरयन राशिचक्र इस्तेमाल करती है, यानी गिनती विषुव से नहीं बल्कि तारों के बीच तय किए गए एक ठिकाने से शुरू होती है। दोनों हिसाबों के बीच का फ़र्क़ अयनांश कहलाता है और इस वक़्त वह करीब 24 डिग्री है। सुर्ख़ियाँ जो हिस्सा हमेशा छोड़ देती हैं वह यह है: वहाँ भी राशियाँ बारह ही हैं। तारों पर टिका वह गोला भी तीस-तीस डिग्री के बारह हिस्सों में कटता है, और ओफ़िउकस उनमें भी नहीं है।
मान लो कोई सचमुच उन 1930 वाली सीमाओं से राशिचक्र बनाना चाहे। नतीजा बेकार निकलेगा, और वजहों का किसी की आस्था से कोई लेना-देना नहीं।
ओफ़िउकस के लिए जो तारीख़ें घुमाई जाती हैं वे धनु के भीतर पड़ती हैं। मतलब जिसे भी किसी लेख ने नई राशि सौंपी, वह पहले भी धनु था और अब भी धनु है। कुंडली में कोई बिंदु अपनी जगह से नहीं हिला।
रही यह बात कि सही कौन सा है, तो सवाल ही टेढ़ा है। राशियाँ असली हैं या तारामंडल, यह पूछना ऐसा ही है जैसे पूछना कि असली महीना कैलेंडर वाला है या चाँद वाला। सायन ज्योतिष तारों के नाम पहने एक मौसमी ढाँचा है, निरयन ज्योतिष तारों पर टिका ढाँचा, और तारामंडलों की सीमाएँ खगोलविदों की फ़ाइलिंग व्यवस्था। तीनों की परिभाषा तय है और तीनों अलग सवालों के जवाब देते हैं।
इससे राशियों के वर्णन ख़ुद परखे हुए साबित नहीं हो जाते। वे लंबे अरसे तक लिखे और पढ़े जाने से जमा हुए अर्थ हैं, जाँच से निकले नतीजे नहीं। पर अगर तुम्हें डर बैठ गया है कि किसी तेरहवीं राशि ने चुपचाप वह पन्ना रद्द कर दिया जिसे तुमने सालों पढ़ा है, तो ऐसा नहीं हुआ। जिस ढाँचे में वह पन्ना लिखा गया उसमें बारह हिस्से हैं और तेरहवाँ जोड़ने का उसमें कोई रास्ता नहीं है।


