अगर तुम्हारा जन्मदिन बदलाव वाली तारीख पर पड़ता है तो जवाब फिर भी एक ही होता है, और वह घंटे से तय होता है।
किसी का जन्म एक साथ दो राशियों में नहीं होता। सूरज एक राशि छोड़कर अगली में एक तय मिनट पर दाख़िल होता है, और हर जन्म उस मिनट के या तो इस तरफ़ पड़ता है या उस तरफ़। सीमा वाले जन्मदिन में उलझन इसलिए नहीं है कि सीमा धुँधली है। उलझन इसलिए है कि वह कैलेंडर पर हर बरस एक ही जगह नहीं बैठती, इसलिए छपी हुई तारीख से मिलान करना तुम्हें ग़लत ख़ाने में डाल सकता है।
ज्योतिष में सीमा एक लकीर है, कोई पट्टी नहीं। अंग्रेज़ी में इसे कस्प कहते हैं, और यह ठीक वह बिंदु है जहाँ एक राशि ख़त्म होकर अगली शुरू हो जाती है। लकीर की अपनी कोई मोटाई नहीं होती, इसलिए आसमान में ऐसा कोई हिस्सा है ही नहीं जो दोनों पड़ोसियों का एक साथ हो। यही शब्द कुंडली के उन बारह ख़ानों के किनारों के लिए भी चलता है जो जन्म के वक़्त और शहर से निकाले जाते हैं।
बोलचाल में लोग कहते हैं कि फ़लाँ शख़्स सिंह और कन्या दोनों का मिला-जुला है। यह पत्रिकाओं का गढ़ा हुआ छोटा रास्ता है, एक मुश्किल जन्मदिन को नाम देने का तरीक़ा, न कि हिसाब में मौजूद कोई तीसरा ख़ाना। किसी भी ज्योतिषी से कुंडली बनवाओ, नतीजे में हर बार एक ही सूर्य राशि आएगी और उसके साथ डिग्री का एक आँकड़ा।
राशि बदलने के पल हर महीने के तीसरे हफ़्ते के आसपास पड़ते हैं, मोटे तौर पर 19 और 23 तारीख के बीच। इसकी जड़ मार्च का विषुव है, जो हमारे कैलेंडर में महीने की 20 तारीख के आसपास आता है, और उसके बाद की हर सीमा वही जगह विरासत में ले लेती है। साल पूरे 365 दिन का नहीं, उससे करीब एक चौथाई दिन लंबा होता है, इसलिए यह पल हर बरस पिछली बार से थोड़ा आगे सरकता है और चौथे बरस लीप का दिन उसे लगभग वापस खींच लाता है।
इससे एक सीधा नियम बनता है। अगर तुम्हारा जन्मदिन छपी हुई बदलाव तारीख पर है, या उसके ठीक एक दिन पहले या बाद, तो उसे ढंग से जँचवाओ। अगर वह उस तारीख से तीन दिन या उससे ज़्यादा हटकर है तो कोई भी आम सूची तुम्हारे लिए सही है और आगे कुछ करने की ज़रूरत नहीं।
किनारे पर जन्मे लोगों को दो चीज़ें अक्सर धोखा देती हैं। पहली, बहुत से देशों में गर्मियों में घड़ी एक घंटा आगे कर दी जाती है और अस्पताल के काग़ज़ पर वही आगे की हुई घड़ी लिख दी जाती है। आधी रात के आसपास हुए जन्म में एक घंटे का यह फ़र्क़ पूरी तारीख ही बदल देता है। दूसरी, पुराने काग़ज़ों का समय कभी-कभी उस घड़ी का होता है जो अब उस जगह चलती ही नहीं। भारत में 1955 तक मुंबई की अपनी स्थानीय घड़ी चलती रही, जो आज की भारतीय मानक घड़ी से करीब 39 मिनट पीछे थी। राशि के बीचोंबीच इन बातों से कुछ नहीं बिगड़ता। किनारे पर ये अकेले ही जवाब पलट देती हैं।
तीसरी चीज़ यादों की है। घर में बताया गया वक़्त अक्सर पूरे घंटे पर गोल कर दिया जाता है, और गोल किया हुआ वक़्त ठीक वही है जो तुम्हें पड़ोसी राशि में सरका सकता है। जन्म प्रमाणपत्र या अस्पताल का रिकॉर्ड मिल जाए तो उसे ही मानो।
यही वजह है कि जवाब में तुम्हारे जन्म का शहर भी चाहिए। बदलाव का पल सारी धरती पर एक ही होता है, पर हर जगह की घड़ी उसे अपने ही अंक में पढ़ती है। जब तक तुम्हारी स्थानीय घड़ी को उस एक साझा पल में नहीं बदला जाता, किसी तालिका से मिलान करना अंदाज़ा ही रहेगा।
किनारे पर जन्मे लोग अक्सर सच्चे मन से कहते हैं कि उन्हें दोनों तरफ़ के ब्योरे अपने ऊपर बैठते दिखते हैं। इसकी वजह सचमुच होती है, पर वह लगभग कभी वह नहीं होती जो वे मान बैठते हैं।
अपनी असली जन्म जानकारी से सूरज की जगह निकलवाओ। कुंडली का हिसाब तुम्हारी तारीख, घड़ी का वक़्त और जन्म का शहर लेकर उन्हें एक साझा पल में बदलता है और फिर बताता है कि सूरज किस राशि में कितनी डिग्री पर खड़ा था। वृष की 29 डिग्री का मतलब वृष है। मिथुन की 0 डिग्री का मतलब मिथुन है। इनके पीछे कोई तीसरा नतीजा छिपा नहीं बैठा।
वक़्त पता न हो तो भी रास्ता बंद नहीं होता। सूरज दिन में करीब एक डिग्री चलता है, इसलिए राशि के अच्छे-ख़ासे भीतर पड़ने वाले जन्मदिन घंटे के बिना भी सुरक्षित हैं। बदलाव वाली तारीख के लिए एक आसान तरकीब है: हिसाब तीन बार चलाओ, एक बार रात 12 बजे के तुरंत बाद के लिए, एक बार दोपहर के लिए और एक बार देर रात के लिए। तीनों बार एक ही नाम आए तो घंटा तुम्हारा जवाब बदल नहीं सकता, और मामला वहीं ख़त्म।
डिग्री का आँकड़ा हाथ आ जाए तो वह उस मिले-जुले नाम से कहीं ज़्यादा बताता है। जो लोग डिग्री के साथ काम करते हैं वे राशि की आख़िरी डिग्रियों को उसका पका हुआ और बार-बार दोहराया गया रूप पढ़ते हैं, और पहली डिग्रियों को उसी स्वभाव का कच्चा, बिना आज़माया हुआ रूप मानते हैं। इसलिए जिन्हें लोग मिथुन-कर्क टाइप कह देते हैं, वे दो लोग लगभग उलटे ढंग से पढ़े जा सकते हैं, और यह फ़र्क़ तभी सामने आता है जब कोई अंदाज़ा छोड़कर गिनती करता है।


