बारह हिस्सों की पूरी सूची, और यह वजह कि दो राशियों की सीमा हर साल एक दिन आगे या पीछे क्यों खिसक जाती है।
राशियों की तारीखें कैलेंडर में तय की हुई नहीं हैं, वे आसमान की घटना हैं। सालभर में सूरज तारों के सामने एक पूरा घेरा बनाता दिखता है, उस घेरे का हर 30 डिग्री चौड़ा टुकड़ा एक राशि है, और राशि ठीक उसी पल शुरू होती है जब सूरज उस टुकड़े की पहली डिग्री पर पहुँचता है। साल पूरे दिनों में नहीं बँटता, इसलिए वह पल हर बरस घड़ी के हिसाब से कुछ अलग जगह पड़ता है। जो सीमा एक सूची में 22 तारीख को छपी है वही दूसरी सूची में 23 को दिख जाती है।
नीचे की सूची ज़्यादातर सालों पर बैठती है और कभी एक दिन से ज़्यादा नहीं चूकती। यह ग्रीनविच की घड़ी से, यानी दुनिया की मानक घड़ी से निकाली गई है, और यह शर्त क्यों मायने रखती है, यह आगे साफ़ हो जाएगा।
तुम्हारा जन्मदिन अगर किसी दायरे के भीतर तीन चार दिन अंदर पड़ता है तो इतनी सूची काफ़ी है। पर अगर वह ऊपर लिखी किसी सीमा पर है, या उसके एक दिन इधर या उधर, तो अकेली सूची तुम्हें ईमानदार जवाब नहीं दे सकती।
सूरज के गिर्द धरती का एक चक्कर करीब 365 दिन और 6 घंटे का होता है, जबकि कैलेंडर का साल 365 दिन गिनता है। इसलिए हर सामान्य बरस में सूरज मेष की पहली डिग्री पर पिछली बार से करीब 6 घंटे देर से पहुँचता है, और तीन बरस में यह देरी 18 घंटे तक चढ़ जाती है। फिर 29 फ़रवरी वाला लीप दिन कैलेंडर को एक दिन आगे धकेल देता है और सीमा लगभग वहीं लौट आती है जहाँ से चली थी।
यानी यह लगातार एक ही तरफ़ सरकने वाली चीज़ नहीं है, चार साल में लौटकर आने वाला झूला है। इसी झूले के भीतर जो सीमा किसी बरस देर रात पड़ती है वह तीन बरस बाद अगली तारीख के शुरुआती घंटों में चली जाती है। आसमान में कुछ नहीं हिला होता, कैलेंडर ही उससे कुछ घंटे आगे या पीछे चल रहा होता है।
बारह शुरुआती बिंदुओं में से चार किसी की बनाई हुई बात नहीं हैं। ये ऐसी घटनाएँ हैं जिनका मिनट वेधशालाएँ पहले से छाप देती हैं, और बाक़ी आठ सीमाएँ इन्हीं चार से नाप ली जाती हैं।
मेष मार्च के विषुव पर खुलती है, यानी उस पल पर जब सूरज भूमध्य रेखा के ऊपर से उत्तर की तरफ़ जाता है और पूरी धरती पर दिन और रात लगभग बराबर हो जाते हैं। कर्क जून के उस पल पर खुलती है जब सूरज अपने सबसे उत्तरी बिंदु तक पहुँच जाता है। तुला सितंबर के विषुव पर खुलती है और मकर दिसंबर के उस दिन पर जब सूरज सबसे दक्षिण में होता है। इन चार बिंदुओं के बीच का फ़ासला 30-30 डिग्री के बराबर कदमों में बाँट दिया जाता है, और बाक़ी आठ शुरुआतें वहीं से निकल आती हैं।
इसी बँधाव की वजह से तारीखें पूरी दुनिया में एक जैसी रहती हैं। ये सूरज के सालाना रास्ते से जुड़ी हैं, बाहर के मौसम से नहीं। ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ़्रीका और अर्जेंटीना में मार्च का विषुव बसंत नहीं बल्कि पतझड़ खोलता है, फिर भी मेष वहाँ उसी पल शुरू होती है।
30 डिग्री बराबर होने का मतलब 30 दिन बराबर होना नहीं है। धरती की कक्षा हल्की सी अंडाकार है और धरती तब सबसे तेज़ भागती है जब वह सूरज के सबसे पास होती है, जो जनवरी के पहले दिनों में होता है। ज़मीन से देखने पर लगता है कि सूरज जनवरी वाले सिरे की राशियों से जल्दी निकल जाता है और उनके सामने वाली राशियों में सुस्ती से चलता है।
सबसे छोटी राशियाँ धनु और मकर हैं, दोनों 29 दिन से थोड़ी ही लंबी। सबसे बड़ी मिथुन और कर्क हैं, 31 दिन से कुछ ऊपर। सबसे छोटी और सबसे बड़ी राशि के बीच करीब दो दिन का फ़र्क़ बनता है, और यह दूसरी वजह है कि एक सुथरी सी सूची हमेशा अंदाज़ा ही रहती है।
सीमा पूरी धरती के लिए एक ही पल पर आती है, पर उस पल के साथ कौन सी तारीख लिखी जाएगी यह इस बात पर टिका है कि तुम किस जगह पर हो। मान लो सूरज वृष की पहली डिग्री पर मानक घड़ी के हिसाब से 20 अप्रैल की रात 11 बजे पहुँचता है। भारत की घड़ी उससे साढ़े पाँच घंटे आगे रहती है, तो यहाँ वही पल 21 अप्रैल की सुबह साढ़े चार बजे बनता है। उस सुबह दो बजे पैदा हुआ बच्चा सीमा से पहले आया, इसलिए वह मेष है, जबकि चलन में मौजूद हर सूची कहती है कि वृष एक दिन पहले शुरू हो चुका था।
अमेरिका के पश्चिमी तट पर, जहाँ घड़ी मानक घड़ी से पीछे रहती है, वही पल अब भी 20 अप्रैल की शाम का होता है। छपी हुई सूचियाँ किसी न किसी एक घड़ी से बनती हैं और शायद ही कभी बताती हैं कि किस घड़ी से। सूचियों के बीच के छोटे फ़र्क़ की यह तीसरी वजह है, और पाठक इसकी उम्मीद सबसे कम करते हैं।
भारत में बहुत लोगों को यह अटपटा लगता है कि मकर संक्रांति तो 14 जनवरी को मनाई जाती है, जबकि ऊपर की सूची मकर की शुरुआत 22 दिसंबर बता रही है। दोनों में कोई ग़लत नहीं है, ये दो अलग हिसाब हैं। यह पन्ना और बाक़ी साइट पश्चिमी हिसाब पर चलते हैं, जिसे सायन कहते हैं और जिसमें राशियाँ मार्च के विषुव से नापी जाती हैं। भारतीय पंचांग निरयन हिसाब पर चलता है, जिसमें राशियाँ उस तारा समूह से नापी जाती हैं जो उस टुकड़े में सचमुच दिखता है।
इस वक़्त दोनों के बीच करीब 24 डिग्री का अंतर है, जिसे दिनों में गिनो तो करीब 24 दिन बैठता है। इसीलिए पंचांग के हिसाब से सूरज मेष में 14 अप्रैल के आसपास जाता है, 21 मार्च को नहीं। यह अंतर बहुत धीरे बढ़ता है, क्योंकि धरती की धुरी एक बड़े चक्र में डोलती है और एक डिग्री सरकने में करीब 72 साल लगते हैं। अगर तुम्हारी जन्मपत्री किसी पंडित ने बनाई है तो उसमें लिखी राशि इसी दूसरे हिसाब की है, और वह इस सूची वाली राशि से एक ख़ाना पीछे निकल सकती है।
सही राशि जान लेना इसलिए काम का है कि किसी भी राशि के लिए जो कुछ लिखा जाता है वह इसी भरोसे पर लिखा जाता है कि तुम्हारी जगह सचमुच वही ख़ाना है। जिसने बरसों तुला के पन्ने पढ़े और असल में जन्म के घंटे तक सूरज कन्या में ही था, उसने तुला के बारे में कुछ ग़लत नहीं सीखा। उसने बस किसी अजनबी के बारे में पढ़ा है।


