आठ कलाएँ एक के बाद एक, उन्हें बनाने वाली सूरज की रोशनी, और पूरे गोल चक्र के 29.5 दिन, जिनसे शुक्ल और कृष्ण पक्ष की गिनती बनती है।
चाँद आठ कलाओं से गुज़रता है और उनका क्रम कभी नहीं बदलता: अमावस्या, बढ़ती हँसिया, पहली चौथाई यानी आधा चाँद, बढ़ता हुआ बड़ा चाँद, पूर्णिमा, घटता हुआ बड़ा चाँद, आख़िरी चौथाई और घटती हँसिया, फिर वही अमावस्या। एक पूरा चक्कर करीब 29.5 दिन में होता है, और महीने का विचार इसी लंबाई से निकला है।
चाँद ख़ुद नहीं चमकता। जो चमक दिखती है वह उस पर पड़ी धूप है, और धूप हर पल उसके ठीक आधे हिस्से पर पड़ती है, वैसे ही जैसे धरती का आधा हिस्सा हमेशा दिन में रहता है। बदलती सिर्फ़ यह बात है कि उस रोशन आधे में से कितना हिस्सा तुम्हारी आँखों की तरफ़ पड़ता है।
चाँद हमारे चारों तरफ़ घूमता रहता है, तो उस चमकते आधे पर हमारा कोण भी बदलता रहता है: कभी हम उसके पीछे होते हैं, कभी बग़ल में, कभी सामने। चाँद जब सूरज और धरती की सीध में पड़ जाता है, रोशन चेहरा परे की ओर मुड़ जाता है और कुछ नहीं दिखता। धरती जब बीच में आती है, वही चेहरा सीधे हमारी ओर होता है और पूरा गोला दिखता है। बीच की सारी शक्लें उसी आधे-रोशन पत्थर के अधूरे नज़ारे हैं।
जो चीज़ ये शक्लें नहीं बनाती, वह है धरती की परछाईं। परछाईं पड़ती ज़रूर है, पर कभी-कभी और सिर्फ़ पूर्णिमा पर, और उसका नाम चंद्र ग्रहण है। महीने भर की आम शक्लें कोण का खेल हैं, परछाईं का नहीं।
नीचे लिखे दिन अंदाज़े के हैं, क्योंकि बदलाव लगातार चलता है, ये आठ अलग घटनाएँ नहीं हैं। आठ में से सिर्फ़ चार का पक्का क्षण होता है: अमावस्या, दोनों चौथाइयाँ और पूर्णिमा। बाक़ी चार बीच में पड़ने वाले दिनों के नाम हैं।
भारत में इन्हीं हिस्सों के नाम पहले से मौजूद हैं। अमावस्या से पूर्णिमा तक चाँद बढ़ता है, इस आधे को शुक्ल पक्ष कहते हैं, और पूर्णिमा से अमावस्या तक वह घटता है, वह कृष्ण पक्ष है। हर पक्ष में 15 तिथियाँ होती हैं। तिथि का नाप चाँद और सूरज के बीच के कोण से बनता है, हर 12 डिग्री पर एक, इसलिए तिथि घड़ी के दिन से थोड़ी छोटी या बड़ी हो सकती है।
इससे पंचांग के नाम ऊपर वाली सूची से जुड़ जाते हैं। अष्टमी के आसपास आधा चाँद दिखता है, यानी वही चौथाई वाली कला, और एकादशी बढ़ते या घटते बड़े चाँद के बीच पड़ती है। फ़र्क़ बस इतना है कि तिथि कोण गिनती है और कला वह शक्ल बताती है जो तुम्हें आँख से दिखती है।
अंग्रेज़ी नाम में एक शब्द अक्सर उलझाता है, चौथाई। आधा चाँद दिखने पर उसे चौथाई क्यों कहते हैं? इसलिए कि गिनती गोले की नहीं, चक्र की है: चाँद अपने पूरे चक्कर का एक चौथाई हिस्सा तय कर चुका होता है।
निकलने के समय के पीछे भी एक साफ़ लय है। चाँद हर दिन करीब 50 मिनट देर से निकलता है, इसीलिए जो हँसिया इस हफ़्ते शाम की चीज़ थी, दो हफ़्ते बाद सुबह से पहले की चीज़ बन जाती है। चाँद में कुछ नहीं बदला, वह बस हमारी घड़ी से पीछे सरकता जाता है।
भारत समेत उत्तरी गोलार्ध से बढ़ती हँसिया दाईं तरफ़ से रोशन दिखती है और घटती हँसिया बाईं तरफ़ से। ऑस्ट्रेलिया, चिली या दक्षिण अफ़्रीका में यह पूरा उलट जाता है, क्योंकि वहाँ खड़ा आदमी हमारे मुक़ाबले सिर के बल खड़ा है। भूमध्य रेखा के पास हँसिया अक्सर नीचे की ओर पड़ी दिखती है, कटोरे जैसी।
इसका एक काम का नतीजा भी है। रोशन किनारा देखकर बताया जा सकता है कि चाँद की तस्वीर धरती के किस हिस्से से ली गई है। उत्तर में सिखाया गया कोई भी याद रखने का नुस्ख़ा दक्षिण में उलटा जवाब देता है।
अंग्रेज़ी महीने 28 से 31 दिन के होते हैं और कलाओं का चक्र करीब 29.5 दिन का, इसलिए दोनों हमेशा एक-दूसरे पर सरकते रहते हैं। जो पूर्णिमा इस महीने की 20 तारीख़ को पड़ी, अगले महीने 18 या 19 को आ जाएगी। लंबे महीने में कभी दो पूर्णिमाएँ समा जाती हैं, और दूसरी वाली को ब्लू मून कहा जाता है।
भारतीय कैलेंडर इसे अलग तरीक़े से सँभालता है। बारह चंद्र महीने मिलकर करीब 354 दिन बनते हैं, यानी सौर साल से ग्यारह दिन पीछे, तो कुछ सालों के अंतर पर एक पूरा महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं। यही जोड़ त्योहारों को उनके मौसम से बहुत दूर नहीं जाने देता।
घड़ी दूसरी हलचल पैदा करती है। भारत में जो पूर्णिमा सुबह 4 बजे पड़ती है, वह लंदन की घड़ी से पिछली रात की घटना है, इसलिए दो बिलकुल सही कैलेंडर एक दिन के फ़र्क़ से तारीख़ छाप सकते हैं।
लंबाई में ही एक और अजीब बात छिपी है। चाँद तारों के मुक़ाबले धरती का चक्कर करीब 27.3 दिन में पूरा कर लेता है, फिर भी उसी कला पर लौटने में करीब 29.5 दिन लग जाते हैं। बीच में धरती भी सूरज के गिर्द आगे बढ़ चुकी होती है, इसलिए वही कोण दोहराने के लिए चाँद को थोड़ा और चलना पड़ता है।
ज्योतिष की परंपरा इन आठ कलाओं को आठ अलग घटनाएँ नहीं, एक लगातार बहती धारा मानती है। पहली लकीर से पूरे गोले तक का बढ़ता हिस्सा जोड़ने, बनाने और चीज़ों को चलाने से जोड़ा जाता है। घटता हिस्सा काम ख़त्म करने, काटने-छाँटने और जो चीज़ अपना काम कर चुकी उसे छोड़ देने से।
व्यवहार में ज़्यादातर लोग इसे भविष्य बताने वाली चीज़ की तरह नहीं, एक कैलेंडर की तरह इस्तेमाल करते हैं: चक्र की शुरुआत में कोई काम पकड़ना, पूर्णिमा पर ईमानदारी से देखना कि वह कहाँ पहुँचा, और रोशनी घटते-घटते बिखरी चीज़ें समेटना। कोण के भौतिक हिसाब में ऐसा कुछ नहीं है जो कहे कि हँसिया के नीचे शुरू हुआ काम बड़े चाँद वाले काम से बेहतर चलेगा, और यहाँ नतीजे का कोई वादा नहीं है। चक्र सचमुच इतना देता है कि हर आधे महीने पर तुम्हारी आँखों के सामने एक पड़ाव आ जाता है, जिसे याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।


