सूर्य राशि और लगभग सारे ग्रह बिना समय के भी निकल आते हैं, लग्न नहीं। समय अक्सर जन्म प्रमाणपत्र पर लिखा होता है।
जन्म का समय न होने से उतना नहीं छूटता जितना लोग मान लेते हैं। तुम्हारी सूर्य राशि किसी भी घंटे पर वही रहती है, धीमे ग्रहों की राशि भी वही, और आधे से ज़्यादा तारीखों पर तो चाँद भी अकेली तारीख से तय हो जाता है। हाथ से निकलती है कुंडली की सिर्फ़ एक परत: वह हिस्सा जिसे क्षितिज से, यानी ज़मीन और आसमान की मिलती हुई लकीर से नापा जाता है।
सूरज को पूरे राशिचक्र का एक फेरा लगाने में करीब एक साल लगता है, यानी हर राशि में तक़रीबन एक महीना और एक दिन में एक अंश भर की चाल। अंश आसमान का नाप है, जिसमें एक पूरी राशि 30 अंश की होती है। इसलिए साल में सिर्फ़ बारह तारीखें ऐसी हैं जिन पर सूरज एक राशि छोड़कर अगली में उतरता है, और घंटा उन्हीं पर मायने रखता है। बाक़ी हर तारीख पर जवाब वही रहेगा।
यही बात बाक़ी ग्रहों पर उतरती है। बृहस्पति और शनि एक पूरे दिन में अंश का छोटा सा टुकड़ा भर खिसकते हैं, उनसे दूर वाले उससे भी कम। बुध, शुक्र और मंगल तेज़ हैं, फिर भी इतने नहीं कि नाश्ते और आधी रात के बीच उनकी राशि बदल जाए। हिसाब में तारीख और शहर डालो, हर ग्रह की राशि वही लौटेगी, समय के ख़ाने में कुछ भी लिखो।
चाँद तेज़ है। 24 घंटे में वह आसमान में करीब 13 अंश आगे बढ़ जाता है, इसलिए सवा दो दिन के आसपास में एक राशि निपटाकर अगली में उतर जाता है। नतीजा यह कि आधे से कुछ ज़्यादा तारीखों पर वह रात 12 बजे से अगली रात 12 बजे तक एक ही राशि में टिका रहता है, और बाक़ी पर बीच में सीमा लाँघ जाता है।
इसे तय करने का तरीक़ा सीधा है। अपनी तारीख दो बार चलाओ, एक बार समय रात 12 बजकर 1 मिनट रखकर और एक बार रात 11 बजकर 59 मिनट रखकर, फिर नतीजे मिलाओ। चंद्र राशि दोनों बार एक ही आई तो उस दिन घड़ी का उससे लेना-देना था ही नहीं। जवाब अलग आए तो सामने बारह नाम नहीं, सिर्फ़ दो हैं, और घर में किसी को इतना भी याद हो कि सुबह थी या शाम, तो चुनना मुश्किल नहीं।
तीन चीज़ें सीधे क्षितिज पर टिकी हैं, और क्षितिज घड़ी पर:
यह छोटी बात नहीं है, क्योंकि कुंडली पर लिखा बहुत सारा लोकप्रिय माल इन्हीं बारह हिस्सों का है। जब कोई ऐप तुम्हें घर वाले या काम वाले हिस्से की ख़बर देता है, वह पीछे से एक जन्म समय ख़र्च कर रहा है जो शायद तुम्हारे पास है ही नहीं। अंदर गया समय गढ़ा हुआ था तो उस पर खड़ी हर मंज़िल भी गढ़ी हुई है।
कौन सा दफ़्तर क्या दर्ज करता है, यह देश और दशक से बहुत बदलता है। इसलिए तुम्हारी नकल पर घंटा न होने का मतलब यह नहीं कि वह कहीं दर्ज ही नहीं हुआ, और मान लेने से पहले ठीक से ढूँढ़ लेना बनता है।
याद से बताए गए समय पर दो चेतावनियाँ हैं। पहली गोल कर देने की: दशकों बाद याद किया गया घंटा लगभग हमेशा पूरा घंटा होता है, और पूरे घंटे ठीक उन्हीं सीमाओं के पास पड़ते हैं जिन पर लग्न राशि पलटती है। दूसरी यह कि जन्म का पल किसे माना गया: पहली साँस, नाल कटने का पल, या वह वक़्त जब किसी ने घड़ी देखी।
ऐसी हालत में ज्योतिषी अंदाज़ा नहीं लगाते, एक तय क़ायदा ओढ़ लेते हैं। सबसे आम क़ायदा है समय को दोपहर 12 बजे रख देना, और वजह सीधा गणित है: दोपहर दिन के बीच में पड़ती है, इसलिए चाँद अपनी चाल के बीचोबीच मिलता है और सबसे बड़ी संभव भूल आधी रह जाती है। दोपहर सच होने का दावा नहीं, ख़ाली जगह भरने वाला अंक है, और पढ़ने वाला कुंडली पर लिख देता है कि समय अज्ञात है।
दूसरा क़ायदा समय को उसी जगह के सूर्योदय पर रख देने का है। इससे सूरज पूरब के किनारे बैठ जाता है और सूर्य राशि ही लग्न राशि का काम करने लगती है, ताकि बारह हिस्सों का ढाँचा इस्तेमाल हो सके। यह तुम्हारा असली लग्न नहीं है और इसे वैसा बताया भी नहीं जाना चाहिए।
तीसरा रास्ता उलटी तरफ़ से चलता है। ज्योतिषी तुम्हारी ज़िंदगी की तारीख वाली घटनाएँ लेता है, घर बदलना, शादी, किसी अपने का जाना, और अलग-अलग संभव समयों को आज़माकर देखता है कि कौन सी कुंडली उनसे मेल खाती है। यह नाप नहीं, व्याख्या है: एक ही ज़िंदगी लेकर दो ज्योतिषी दो अलग समयों पर पहुँच सकते हैं, क्योंकि घटनाओं का वज़न दोनों अपने ढंग से तय करते हैं। इस तरह निकला घंटा काम चलाने की मान्यता है, लौटाया हुआ रिकॉर्ड नहीं।
समय के बिना बनी कुंडली अधूरी है, टूटी हुई नहीं। सूरज तुम्हारे पास रहता है, चाँद अक्सर रहता है, हर ग्रह अपनी राशि में रहता है, और ग्रहों के आपसी कोण भी ज़्यादातर बचे रहते हैं, क्योंकि वे ग्रहों से नापे जाते हैं, क्षितिज से नहीं। दिन भर में सिर्फ़ चाँद वाले कोण हिलते हैं, और वे भी जानी-पहचानी हद के अंदर।
अधूरी कुंडली को काम का बनाने वाली चीज़ एक ही है: हर लकीर पर सच लिखा हो। तुम्हें पता रहे कि कौन सी बात पक्की है, कौन सी जगह सिर्फ़ भरने को रखी है और कौन सी है ही नहीं। जो साफ़ कह देता है कि तुम्हारा लग्न पता नहीं, वह उससे बेहतर है जो ख़ाली जगह चिकनी भरकर आगे बढ़ जाता है, क्योंकि हवा में खड़ा जवाब सालों तक तुम्हारे पीछे-पीछे चलता है।


